Thursday, August 2, 2012

पूर्व सुखराम ब्रह्मण अब नव-मुस्लिम फारूक़ आजम से एक मुलाकात interview

तिहाड और दूसरी जेलों  में हजारों खतरनाक कैदियों को और नागपुर जेल में जेलर को ही अनेकश्‍वरवाद की दुनिया से निकालने वाले  पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम फारूक़ आजम का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' अगस्‍त 2012 ईं  के लिए मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया interview साक्षात्कार 

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
(ब्रह्मण) पूर्व सुखराम अब नव-मुस्लिम फारूक़ आजम: वालैकुम सलाम

अहमद: आप इस वक्त कहां से आ रहे हैं?
फारूक आजम: में चार महीने की तब्लीगी जमात में हूं, हमारी जमात दो चिल्ले लगाकर पहुंची है, तीसरी चिल्ले के लिए महाराष्‍ट्र का रूख बना है अर्थात तय हुआ है, परसों का रिजर्वेशन हुआ है, आज सोचा हजरत से मुलाकात हो जाए, अल्लाह का शुक्र है मुलाकात हो गयी।

अहमद: जमात में आपने वक्त कहां लगाया?
फारूक आजम: पहला चिल्ला गुजरात में लगा और दूसरा राजस्थान में।
  (जमात या तब्‍लीगी जमात यानि कुछ मुसलमान मिलकर धर्म के लिए इधर उधर अपने खर्चे से यात्रा करते हैं, चिल्‍ला यानि 40 दिन, नव-मुस्लिमों के लिए यह चलता फिरता मदरसा साबित होता है)

अहमद: आपके यह तीनों साथी भी आपके साथ जमात में हैं?
फारूक आजम: जी यह मेरे जेल के साथी हैं और इन्होंने भी मुझ से ही कुछ महीने पहले इस्लाम कुबूल किया है। यह  अब्दुर्रहमान भाई जो बहराईच यु पी के रहने वाले हैं, यह भी एक झूटे मुकदमें में दिल्ली में फंस गए थे, तिहाड जेल में थे, मुझ से ही दो महीने बाद मुसलमान हो गए, और छ महीने बाद जेल से छुट गए, इनको मैं ने जमात(धर्म के लिए यात्रा) के लिए घर से बुलाया है, और यह दूसरे शकील अहमद भाई हैं यह पन्जाब में पटियाला के रहने वाले हैं, यह भी जेल में मेरे साथ थे, और मुझ से चार महीने बाद मुसलमान हुए, यह भी तीन साल पहले बरी हो गए थे, इनको भी साथ में जमात के लिए मैं ने बुलाया था, और यह तीसरे मुहम्मद सलमान भाई यह लोनी गाजीयाबाद के हैं, इन्हों ने मुझ से छ महीने बाद इस्लाम कुबूल क्या था, और इस्लाम कुबूल करने के छ रोज बाद यह रिहा हो गए थे, इन्हों ने जेल से जाकर चालिस दिन जमात में लगाए थे, मगर मेरे साथ वकत लगाने का वादा था इस लिए फिर मेरे साथ चार महीने लगा रहे हैं।

अहमद: आपका वतन कहां है?
फारूक आजम: मैं गोरखपुर यू.पी. के एक गांव का रहने वाला हूं, आठवीं क्लास के बाद चाचा के साथ दिल्ली 1989 में रोजगार के लिए आ गया था, जिन्दगी का अकसर हिस्सा दिल्ली में गुजरा, आखिर के यह छ साल तो जेल में गुजरे।

अहमद: जेल में आप कैसे चले गये?
फारूक आजम: असल में हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बुरी सोहबत से बचने का हुकुम दिया है, लुहार के पास अगर आग न लगे तो धुवां तो लगेगा ही, हम कुछ लोग जमनापार में साथ रहते थे, लक्ष्मीनगर के एक आदमी का कतल हो गया उसकी हमारे एक साथी से चंद रोज पहले लडाई हुई थी, जिस से लडाई हुई थी, उसकी सोहबत अच्छी नहीं थी, जो असल कातिल थे उन्होंने पैसे दे कर होशियारी से हम लोगों के नाम वो कतल लगा दिया और हम लोगों को जेल जाना पडा, मेरे अल्लाह का करम था, हमारे मुकदमे की कोई पेरवी करने वाला नहीं था।

अहमद: ये क्या बात आप कह रहे हैं?
फारूक आजम: मैं सच कह रहा हूं, मौलाना अहमद साहब, हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने क्या सच फरमाया कि कुछ लोग ऐसे होंगे कि उनकी गरदन में तोक(रस्‍सी) डाल कर अल्लाह ताला खींचकर जन्नम में दाखिल करेंगे, मुझे बिल्कुल ऐसा लगता है कि मेरे अल्लाह का वो करम हमारे और हमारे जेल के साथियों के लिए है, मेरे अल्लाह ने जिस तरह हमें जेल में भेज कर हिदायत से नवाजा।

अहमद: आप जरा तफसील बताइए?
फारूक आजम: मैं ने बताया न कि मैं बचपन में अपने चाचा के साथ रोजगार के लिए दिल्ली आ गया था, शुरू में एक हार्डवेयर की दुकान पर मेरे चाचा ने मुझे लगाया फिर मेरे चाचा यहां आकर एक औरत के चक्कर में पड गए और फिर घरबार को छोड दिया, मेरे पिताजी का देहांत हो गया बाद में मैं ने कुछ बेकरी(बिस्‍कुट,पापे, डबल रोटी आदि) आईटम सप्लाई के लिए एक रेहडा रिक्शा खरीदा और एक के बाद एक कुछ न कुछ सप्लाई का काम करता रहा। मार्च 2001 में मेरी शादी मां ने करादी, 2006 में मुझ पर मुकदमा कायम हुआ और मैं अपने साथियों के साथ जेल में चला गया, जेल में तन्हाई में मैं बहुत गौर करता, कि मुझे भगवान ने किस जुर्म में जेल भेजा, असल में, जब मैं हिंदू था, जब भी मेरे दिल में इसका पक्का यकीन था कि जो कुछ होता है मालिक की मरजी से होता है, यह दुनिया के सारे लोग कठपुतली हैं, जैसे वहां से उंगली हिलती है यह नाचते हैं, तो मैं सोच में बहुत डूब जाता कि मुझे जेल में मालिक ने क्यूं भेजा है, जब मैं बेकसूर हूं और मेरी कोई पेरवी करने वाला भी नहीं तो मेरे दिल में कोई कहता कि तुझे कुछ देने के लिए और बनाने के लिए। तीन साल पहले दिल्ली के एक वकील साहब बचपन के किसी मुकदमे में सजायाब होकर तिहाड जेल पहुंचे, जेल में बहुत चर्चे थे, कि दिल्ली हाईकोर्ट के इतने बडे वकील साहब जेल में आ गए हैं, वकील साहब के बाकायदा दाढी थी, बडे मौलाना लगते थे, सब कैदी उनसे दबे रहते, मुकदमों के सिलसिले में मशवरा करते, वो मुफीद मशवरा देते, लोग उनसे मालूम करते कि आप इतने बडे वकील हैं फिर भी जेल में आगए, उन्होंने कहा जज रिश्‍वत मांग रही थी, मैं ने रिश्वत देने के मुकाबले में जेल को मुनासिब समझा, लोग कहते कि रिश्वत दे देनी चाहिए थी, तो वो कहते, रिश्वत देने से, मरने के बाद खतरनाक जेल जहन्नुम में जाने के बजाए यह आरजी अर्थात कुछ समय की तिहाड जेल अच्छी है। (रिश्‍वल लेना-देना हराम है)

 वो मुकदमों के सिलसिले में मशवरे के दौरान कैदियों से मालूम करते कि इस कैद में इतने परैशन हो रहे हो, जहां खाना, पानी, इलाज, पंखे, बिस्तर सब हैं, मरने के बाद की जहन्नुम की जेल की परवा क्यूं नहीं? जहां न खना, न पानी और सजा ही सजा है, कैदियों को उनके मौलवियाना हुलिए और हर एक की हमदर्दी के जज्बे की वजह से बहुत ताल्लुक हो गया था, वो उनकी बात को बहुत गहराई से लेते थे, जेल में वो मुसलमानों में भी नमाज वगेरा की दावत का काम करते थे, और गैर मुस्लिम कैदियों को हजरत की किताब ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘ देते, ‘‘मरने के बाद क्या होगा?‘‘ और ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ यानि हिन्दी में नव-मुस्लिमों के इन्टरव्यूज भी पढवाते।

मौलाना अहमद साहब मेरे जितने साथियों ने इस्लाम कुबूल किया है, सारे साथियों का खयाल यह है कि हिन्‍दी में ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘ (इंग्लिश में RETURNING YOUR TRUST) ऐसी लगती है जैसे किसी उमरकैद की सजा काट रहे कैदी को अचानक रिहाई का परवाना मिल जाए, और मैं तो बिल्कुल इसको मालिक के यहां से कैद से रिहाई का परवाना ही समझता हूं, 17 जनवरी 2010 को मैं ने तिहाड में इस्लाम कुबूल किया, दिसम्बर 2010 में हम कुछ लोगों को नागपुर जेल भेजा गया, वकील साहब के साथ मिलकर मैंने काम किया, अल्हम्दु लिल्लाह कुल मिलाकर तिहाड में 37 लोगों ने इस्लाम कुबूल किया, उनमें एक बजरंग दल के वो साहब भी थे, जिन्हों ने 1992 के फसादात में दो मस्जिद के इमामों को कतल किया था, और बाद में वो खुद इतने पछताए कि कतल में जेल चले गए।

अहमद: नागपुर में भी आप ने काम किया?
फारूक आजम: नागपुर में इस साल मार्च में रिहाई तक रहा, और अल्हम्दु लिल्लाह में यह सोच कर जेल में रहा कि मुझे अल्लाह ताला ने हजरत यूसुफ अलैहिस्सलाम की सुन्नत जिन्दा करने के लिए जेल के अन्दर कैदियों को जहन्नुम की जेल से आजाद कराने के लिए भेजा है, अल्हम्दु लिल्लाह 67 लोग नागपुर जेल में मुसलमान हुए। नागपुर जेलर के पास लोगों ने शिकायत की, मुझे मालूम हुआ कि वो मुझे बुलाकर बात करने वाले हैं, मैं ने इस खयाल से, इससे पहले कि अन्धेरे वाले चिराग को बुझाने को कहें, हमें अन्धेरों को रोशन करना चाहिए, जेलर आर के पाटिल से वकत लिया, सब से पहले मैं ने उनको कानून की आरटीकल 25 के हवाले से मुलक के हर शहरी को अपने मजहब की दावत देने के मूल अधिकार की बात जरा जोर देकर कही, कि आप मुलक के किसी शहरी को इस से रोकेंगे तो कानून तोडेंगे, उसके बाद मैं ने उनको अपना परिचय कराया और बताया कि मालिक जानता है कि मैं बिल्कुल बे-कुसूर सजा पा रहा हूं, और उस मालिक ने मुझ कैदी को नागपुर जेल में आप जेलर पाटिल साहब को नर्क की खतरनाक जेल से छुडाने के लिए भेजा है, मैं ने कुछ आखिरत की बात कह कर उनको  ‘‘आपकी अमानत - आपकी सेवा में‘‘  पुस्तक दी और उनसे पढने का वादा लिया, और इस पर कि वो जरूर इस किताब को पढें, उनकी मां के दूध की कसम ली, वो किताब उन्होंने पढी, उनकी सोच की दुनिया बदल गयी, उन्होंने दूसरी कोई पुस्तक मांगी तो मैं ने  ‘‘मरने के बाद क्या होगा?‘'  फिर ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ यानि हिन्दी में नव-मुस्लिमों के इन्टरव्यूज की पुस्तक उन तक पहुंचाई। मालिक का करम है, उन्होंने इस्लाम कुबूल किया, पिछले साल रमजान से पहले वो मुसलमान हो गए हैं, अभी आम एलान तो नहीं कर सके, उन्होंने पिछले साल रमजान के ऐसे सख्त रोजे रखे और नागपुर के कुछ कारोबारी मुसलमानों के साथ मिल कर जेल में इफतार  और सहरी (रोजा रखने के  खाना-पीना)का बहुत अच्छा इन्तजाम कराया और फिर दिल्ली सफर करके मेरे केस की पेरवी की, वकील अपने खर्च से किया, अल्हम्दु लिल्लाह मेरी रिहाई हो गयी।

अहमद: आपके घर वालों को मालूम हो गया?
फारूक आजम: मैं जेल से ही अपनी मां और भाईयों को खत के जरिए दावत देता रहा, जेल से रिहा होकर घर गया, मेरी मां और दो भाई अल्हम्दु लिल्लाह पहले से तैयार थे, उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मेरे चचा के बेटे जो डाक्टर हैं वो भी मुसलमान हो गए हैं, मैं हजरत की तकरीर की सी डी नागपुर से लाया था, उसमें उन्होंने कहा है कि इस्लाम एक नूर है, अगर कोई शख्स इस्लाम लाएगा तो चिराग की तरह इस्लाम के नूर से मुनव्वर होगा, जहां रहेगा वो रौशनी फेलाएगा, मोमिन जहां हो, इस्लाम का नूर उससे जरूर फेलेगा, किसी चिराग के बस में नहीं कि वो रौशन हो और रौशनी न फैलाए, इसी तरह मोमिन के बस में ही नहीं कि वो दाई न हो(दाई यानि इस्‍लाम की दावत देने वाला), अल्हम्दु लिल्लाह हमारे जो साथी तिहाड जेल से मुसलमान हुए और जो नागपुर से हुए हर एक को दावत की धुन है, एक मुहम्मद उमर नागपुर से औरंगाबाद जेल में गए वहां पर बहुत लोगों ने इस्लाम कुबूल किया, एक महुम्मद इकबाल बरेली जेल गए, वहां पर एक डाक्टर साहब के साथ मिलकर बहुत काम किया, एक मुहम्मद इस्माइल रोहतक जेल में गए, वहां पर इक्कीस लोग मुसलमान हुए और ‘‘या हादी या रहीम‘‘ पढ कर लोग रिहा होते गए, उनमें से अक्सर ने जाकर काम किया, और अपने घरों में अपनी जिन्दगी की मकसद दावत बना कर काम कर रहे हैं।
(हजरत कलीम साहब के मुताबिक इन शब्‍दों को सौ-सौ बार रोजाना दोहराने से दुआ कुबूल हो जाती हैं,,अधिक समझने के लिए इस विडियो से दावत देने के सवाब और विडियो के आखिर हिस्‍से में इस दुआ बारे में समझें  http://www.youtube.com/watch?v=tgZP4fN5RMg)

अहमद: अबी से (यानि मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी) तो आप पहली मर्तबा मिले होंगे?
फारूक आजम: बजाहिर तो पहली मर्तबा मिले, मगर आपकी अमानत और नसीमे हिदायत के झोंके पुस्तक और वकील साहब से चूंकी वो हजरत साहब से मुरीद हैं उनकी बातें सुन-सुन कर ऐसा ताल्लुक हो गया है, ऐसा लगता है जैसे हम हजरत की तर्बीयत से पले हैं, और अब बयानात की सी डी ने हजरत के बोल याद करा दिए हैं, देखने और मिलने से भी ऐसा लगा जैसे हजरत को बहुत देखा है।

अहमद: अब आप का क्या इरादा है?
फारूक आजम: जमात में वक्ल लगा कर हजरत के पास कुछ वक्त गुजारना है, और फिर गोरखपुर के आस-पास दावत का काम करना है।

अहमद: आपके बीवी बच्चों का क्या हुआ?
फारूक आजम: अल्हम्दु लिल्लाह मेरी बीवी और दोनों बच्चे इस्लाम में आ गए हैं।

अहमद: उनके खर्चे वगेरा का इस दौर में क्या हो रहा है?
फारूक आजम: मेरी बीवी ने अपने जेवर बेच कर अपने भाई के साथ मिल कर एक कारोबार क्या था, अल्हम्दु लिल्लाह उस में बडी बरकत हुइ, मेरी बीवी ने मुझे जमात का खर्च दिया, और उसने तै किया है कि वो हजरत खदीजा रजि. की तरह अपने माल को दावत पर खर्च करेगी, इत्तफाक से हमारे रिवाज के खिलाफ वो उमर में मुझ से आठ साल बडी हैं, इस तरह अल्लाह का करम यह है कि एक तरह यह सुन्नत भी अल्लाह ने बे-मांगे दे दी।

अहमद: तब्लीगी जमात में आप रहे तो आपका दिल गैर मुस्लिमों में दावत को नहीं चाहा?
फारूक आजम: असल में अभी तब्लीगी जमात में इसकी खुल कर इजाजत नहीं, मगर कोई मौका मिल जाता है तो फिर आदमी क्या करे, राजस्थान में हम कोटा में काम कर रहे थे, गश्त के लिए जा रहे थे, एक आश्रम के सामने कुछ लोग बैठे थे, आश्रम के जिम्मेदार भी थी, हमें रोक कर बोले, आप लोग धर्म के नाम पर जमात में निकले हो, तो क्या हम तुम्हारे भाई नहीं? हम से ऐसी नफरत के साथ क्यूं निगाह चुरा कर जा रहे हो, हमें भी बताओ, मैं ने अमीर साहब से इजाजत ली और सब से गले मिला और बात की, अल्हम्दु लिल्लाह चारों लोगों ने नकद कलिमा पढा, और हमारे साथ गश्त कराया, नमाज पढी और फिर बात के बाद तशकील हुई, चिल्ले के लिए  यानि 40 दिन की धर्म यात्रा के लिए नाम भी लिखाए, इस तरह से एक दो कहीं-कहीं काम होता रहा।

अहमद: इस मर्तबा आप के अमीर जमात(टोली अध्‍यक्ष) कौन हैं?
फारूक आजम: असल में मुझ से मालूम क्या तो मैं ने बताया कि मैं दो चिल्ले लगा चुका हूं, तो फिर जमात का मुझे ही अमीर बना दिया गया, जमात में अलग-अलग जगह के लोग हैं, मैं ने बहुत मना भी किया। मगर मेरे साथ बस मेरे यह तीनों साथी भी हैं जिनका यह तीसरा चिल्ला है, दो साहब हैं जिनके छ साल पहले चिल्ले लगे थे, इन साथियों में से कोई तैयार नहीं हुआ, मजबूरन मुझे ही अमीरे जमात बना दिया गया।

अहमद: आप का पहले नाम क्या था? क्या आप ने नाम जेल में ही बदल लिया था?
फारूक आजम: मेरा नाम सुखराम था, हमारा खान्दान ब्रह्मण खान्दान है, वकील साहब ने मेरा नाम मुहम्मद फारूक आजम रखा, और मुझ से कहा तुम फारूक आजम रह. की तरह इस्लाम की मजबूती और कुव्वत के लिए काम करना, मुझे भी अच्छा लगा, अल्लाह के लिए क्या मुश्किल है कि नाम की बरकत से मुझ कमजोर को ताकतवर बनाकर इस्लाम की ताकत का जरिया बना दे।

अहमद: आप रमजान में अल्लाह के रास्ते में होंगे, आप हमारे लिए भी दुआ किजिए?
फारूक आजम: मौलाना अहमद साहब, आपके घर से जिस्मानी और जाहिरी ताल्लुक मेरा पुराना नहीं, मगर रोएं रोएं में आपके घराने से ताल्लुक है, हजरत और हजरत के हर साथी बल्कि कुत्ते का भी में अपने को अहसानमंद पाता हूं

अहमद: वाकई अल्लाह ताला की रहमत और शाने हिदायत देखनी हो तो आपको देखिए, कि अल्लाह ने गले में रस्सी डाल कर आपको इस्लाम और जन्नत की राह पर डाल दिया।
फारूक आजम: अच्छा आपको नहीं लगता। वो हदीस जब पढता हूं कि कुछ लोग ऐसे होंगे कि फरिश्ते उनको अल्लाह के हुकुम से गले में रस्सी डाल कर घसीटते हुए जन्नत में दाखिल करेंगें, मुझे तो एसा लगता है कि वो रस्सी मेरे गले मे पडी है, और फरिश्ते मुझको घसीटते ले जा रहे हैं।

अहमद: आपक का यह इन्टरव्यू हमारे उर्दू मेगजीन ‘‘अरमुगान‘‘ में छपेगा। आप इसके पढने वालों को कुछ सन्देश,पेगाम देंगे?
फारूक आजम: मैं दो दिन का मुसलमान क्या पेगाम दे सकता हूं, बस मैं तो यह कह सकता हूं कि एक मुसलमान की हैसियत रौशन चिराग की है जो रौशन होगा तो रौशनी फेलाएगा, जहां रहेगा रौशनी फेलाएगा, और जिस चिराग की लो से उसकी लो करीब होगी, तो बुझे चिराग का जला देगा,
मुसलमान जहां रहे अगर वो इस्लाम और इमान का नूर वहां नहीं फैला रहा है, और वो दावत का काम नहीं कर रहा है, और कुफर और शिर्क के अन्धेरे दिल, ईमान से मुनव्वर नहीं हो रहे हैं तो वो बुझे चिराग की तरह है, बुझा चिराग, चिराग कहलाने के लायक नहीं, मुसलमान को दाई यानि इस्‍लाम की दावत देने वाला होना चाहिए, जहां कुफर और शिर्क के अन्धेरे दिल हों, वहां ईमान और इस्लाम की दावत से उन्हें मुनव्वर करना चाहिए और जो मुसलमान दावत का काम नहीं कर रहे हैं उन बुझे चिरागों की लो से अपने दिल की कोई लो लगाकर उनको रौशन करना चाहिए, ताकि वो भी दाइ बन जाऐं, एक वकील साहब ने जेल में आकर मुझ बेजान आदमी के दिल के चिराग को अपने चिराग की लो लगा कर जलाया और इमान से मुनव्वर किया, अब अगर में, चिराग से चिराग और चिरागों से चिराग, तिहाड जेल नागपुर, बरेली, रोहतक, औरंगाबाद और जेल से रिहाई पाकर घर जाकर काम करने वालों के जरिए हिदायत पाने वालों का हिसाब लगाउं तो तादाद हजार से भी ज्यादा हो जाएगी, यह बात सही है कि यह तादाद है ही क्या, इस सिलसिले में हजरत की बात ही ठीक है कि जो लोग अभी कुफर और शिर्क पर जहन्नुम की तरफ जा रहे हैं उनकी तादाद साढे चार अरब से ज्यादा है, उनके मुकाबले में जो इस्लाम की तरफ आ रहे हैं हरगिज काबिले जिकर नहीं। मगर यह भी हकीकत है कि एक चिराग से एक चिराग जलकर की सारी दुनिया के साढे चार अरब की अन्धेरियां दूर हो सकती हैं, इस लिए सारी दुनिया के मुसलमानों से, खसुसन मासिक 'अरमुगान' पढने वालों से मेरी दरखास्त है कि अगर आपके जरिए सुबह से शम तक कोई करीब रहने वाले खूनी रिश्ते के भाई बहन की कुफर और शिर्क की अन्धेरी कम नहीं हुई और आप उसको इस्लाम के करीब न कर सके, और साथ रहने वाले मुसलमान भाईयों के दिल की कोई लो अपने दिल की लो लगाकर आपने उसके अंदर कुछ दावती जज्बा और जौत नही जलाई तो फिर आप जिन्दा मोमिन नहीं बल्कि बुझे चिराग हैं, जो हकीकत में चिराग कहलाए जाने के लायक नहीं। दूसरी दरखास्त यह है कि रमजान का मुबारक महीना आ रहा है, अल्लाह की खास अता का महीना है हमें वफादार बंदों की तरह इस माह का इस्तकबाल करना चाहिए और हुदा लिलनास कुरआन मजीद के इस जशन शाही में इस बार अपने अल्लाह से पूरी दुनिया के लोगों की हिदायत मांगनी चाहिए, मैं ने तो पिछले दो सालों में तजुर्बा किया, मैं ने जिन-जिन लोगों का नाम ले कर पिछले दोनों रमजानों में हिदायत की दुआ मांगी, मेरे अल्लाह ने मेरी दरखासत कुबूल कर ली, और फिर दावत देने में बिल्कुल भी मुश्किल पेश नहीं आई।

अहमद: माशा अल्लाह आपको अल्लाह की जात पर यकीन में सहाबा के ईमान का हिस्सा मिल गया है?
फारूक आजम: इतनी बडी बात कहां कह रहे हैं? हम तो सहाबा के पांव की खाक भी नहीं, हां मगर उनको अपना बडा कहने पर फखर है, और हम उनका अकीदत से नाम लेने वाले जरूर हैं।

अहमद: बहुत बहुत शुक्रिया , अस्सलामु अलैकुम
फारूक आजम: वालैकुम सलाम

साभार उर्दू मासिक ‘अरमुगान‘ अगस्त 2012
with thanks: www.armughan.in

---
Nateeje nikalne Lage
उपरोक्‍त बातें पढकर हम जान गए कैसे जेलों में भी माशाअल्‍लाह दायी हजरात काम कर रहे हैं,,, अब नतीजे सामने आने लगे - Urdu Daily 'inquilab' 29-11-2012 merut edition


Thursday, June 28, 2012

अब्दुर्रहमान (पूर्व ब्रह्मण) से एक मुलाकात

बंदर के द्वारा अनेकश्‍वरवाद की दुनिया से निकले  पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान  का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' जूलाई  2012 ईं में मौलाना मुहम्‍मद कलीम सिद्दीकी साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया interview साक्षात्कार

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम

अहमद: अब्दुर्रहमान भाई आप दिल्ली में कहां से तशरीफ लाए हैं?
अब्दुर्रहमान: जी में दिल्ली में रोहिणीमें रहता हूं, वहीं से आया हूं ।

अहमद: आप पिछले हफ्ते भी तशरीफ लाए थे?
अब्दुर्रहमान: जी हां अपनी पत्नि के साथ पिछले इतवार को आया था आज में अपने दोनों बेटों और बेटी को हजरत कलीम साहब से मिलाने लाया हू, असल में कल मेरी बेटी ससुराल से आयी थी, हमने बताया कि हजरत से हमारी मुलाकात हो गयी है तो बेटी ने बहुत जिद की कि मुझे भी मिलाइए, असल में उसने ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ किताब पढी है इस लिए वो बहुत ज्यादा हजरत से मिलना चाहती थी।

अहमद: आप पहले से कहां के रहने वाले हैं, रोहिणि तो अब रहते होंगे?
अब्दुर्रहमान: जी हम लोग पहले से रोहतक जिले के एक गांव के रहने वाले हैं, 26 साल हुए दिल्ली शिफ्ट हो गए हैं, हमारा खानादान धार्मिक हिन्दू घराना है, जात से हम लोग खानदानी ब्रह्मण हैं, मुझे ऐसा लगता है कि यह ब्रहमण आर्यन कोमें हैं, शायद यह लोग इब्राहिमी लोग होंगे, इस लिए कि मक्का के मुशरिक जो अपने को इब्राहिमी दीन पर कहते थे, उनका कलचर हमसे बहुत मिलता जुलता है, हो सकता है कि हम लोग हजरत इबराहीम के खानदान में भी रहे हों।

अहमद: आपने खूब सोचा, हो सकता है ऐसा ही हो, आपको इस्लाम कुबूल किए कितना जमाना हो गया?
अब्दुर्रहमान: यूं तो इस्लाम कुबूल किए मुझ आठ साल हो गए, मगर ऐसा लगता है कि मैं असली मुसलमान तो पिछले इतवार को हूआ हूं, असल में हिन्दू पंडितों के चक्कर से तो आठ साल पहले निकल गया था, मगर मिशाल मशहूर है आसमान से गिरा खजूर में अटका, मुसलमान बनके, पीरनुमा एक पेशावर बहरूपिए मुसलमान पंडित के चंगुल में फंस गया था और इस जालिम ने हिंदू पन्डितों को अच्छा कहलवा दिया।

अहमद: अबू कलीम साहब बता रहे थे कि एक जाहिल पीर आपको एक जमाने तक ठगता रहा, क्या उन्होंने ही आपको इस्लाम की दावत दी थी?
अब्दुर्रहमान: नहीं वह इस्लाम की दावत किया देते, मुझे तो एक बंदर ने दावत दे कर मुसलमान बनाया, हजरत कह रह थे कि आपका इस्लाम हमारे लिए एक बडी वार्निंग है कि अगर मुसलमान अपनी जिम्मेदारी अदा नहीं करेंगे और दावत इस्लाम के अपने फरीजे अर्थात कर्तव्य को अदा नहीं करेंगे तो अल्लाह ताला बंदरों से दावत का काम लेकर ब्रहमणों को मुसलमान बनाएंगे।

अहमद: जरा तफसील से सुनाइए , अल्लाह ताला ने आपको किस तरह हिदायत दी?
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिमअब्दुर्रहमान: असल में खानदानी तौर पर ब्रहमण होने की वजह से मैं बहुत धार्मिक किसम का हिंदू था, और सब से अधिक मेरी अकीदत वैष्णो देवी से थी, उसके अलावा काली और अबा जी का भी उपाषक था, इस लिए साल में दो बार वैष्णो देवी की यात्रा करता था, शायद आप जानते होंगे, वैष्णो देवी का खास मन्दिर कशमीर में है, वहां जाना ऐसा है जैसे हज वगेरा करना, यूं समझो कि मैं भी साल में दो बार उमरे को जाता था, उमरा तो आदमी सौ फीसद अपने एक अल्लाह के साथ अपने इमान और एक अल्लाह की मुहब्बत को बढाने के लिए जाता है, वैष्णो देवी पर तो आदमी, हक को छोड कर शिर्क में भटकने के लिए जाता है, मेरे कहने का मकसद यह है कि जितना वक्त और पैसा उमरा में लगता है, उतना ही तकरीबन वैष्णो देवी की यात्रा में लगता है, हां महनत वैष्णो देवी की यात्रा में और ज्यादा है, यह कि वहां पैदल पहाड की बडी चढाई में आदमी का हाल खराब हो जाता है, इस के एलावा भी अलग अलग मंदिरों में जाता था, मेरी कमाई और वकत का एक खास हिस्सा इन पूजाओं में लगता था, बहुत बर्त यानि हिंदू रोजे रखता था, मेरे घर में एक खास कमरा जिसके तीन हिस्से करके अलग अलग देवियों के मन्दिर बनाए हुए थे, आठ साल पहले नोरते यानि खास हिंदू रोजे चल रहे थे, एक शाम को मैं बरत में पूजा में मगन था, बडी अकीदत से नम्बरवार एक के बाद एक देवी की पूजा की प्रशाद चढाता और अकीदत से दीप जलाता, अचानक पीछे के रास्ते से एक बंदर घर में घुस गया उसने कमरे में घुस कर प्रसाद पर झपटे लगाए तो दीप गिर गए और पूरे कमरे में आग लग गयी, और आग इस कदर लगी की तीनों देवियां और पूरा कमरा आग में झुलस गया, मेरे दिल में आया कि जो देवियां खुद अपनी हिफाजत नहींकर सकीं और जल कर झुलस गयीं, वो पूजा के लायक कैसे हो सकती हैं ? मैं इस आस्‍था और अकीदत से बहुत बद दिल होकर घर से निकला, घर से कुछ दूर एक किसी पीर की कबर पर एक मेवाती बाबा हजार दाने वाली तस्बीह (माला) लिए बैठे थे, मैं ने उनसे कहा मैं मुसलमान होना चाहता हूं, वो पीर बाबा बोले, मुसलमान होकर तुम्हें मेरा मुरीद (धर्म शिष्य) भी होना पडेगा, मैं ने कहा कि मुसलमान होने के लिए मुरीद होना भी जरूरी है, वो बोले पक्का मुसलमान तो तब ही होगा जब मुरीद हो जाएगा, मैं ने कहा कि मैं मुरीद भी हो जाउंगा, वो बोले मैं दो तरह के मुरीद करता हूं, एक मुरीद तो ऐसा होता है कि मुरीद होकर नमाज और रोजे और सारी इबादतें तुम्हें ही करना होंगी, एक मुरीद ऐसे होते हैं कि मुरीद तो मुरीद ही होता है, वो इबादात ठीक तरीके पर कहां कर सकता है, मैं ही तुम्हारी तरफ से नमाज और रोजे अदा करूंगा, उसके लिए तुम्हें माहाना खर्च देना पडेगा, मैंने मालूम किया कि माहाना खर्च किया पडेगा, वो बोले तुम्हारी आमदनी कितनी है, तुम बताओ उस मालिक के नाम पर तुम कितने खर्च कर सकते हो, मैं ने कहा मैं हाथ से बनी देवियों के नाम पर इतना खर्च करता था, तो उस मालिक के नाम पर मैं जान भी दे सकता हूं, वो बोले तो फिर अच्छा मुरीद और अच्छी नमाज रोजा पीर साहब से करवाने के लिए दस हजार रूपए माहाना खर्च करने पडेंगे, मैंने कहा मालिक का दिया बहुत है उसके नाम पर हजार रूपए कोई बडी बात नहीं। पीर बाबा ने मुझे कलिमा पढाया और एक चादर मेरे सर पर डाल कर मुझे मुरीद कर लिया, मुरीद(धर्म शिष्‍य) करने के लिए देर तक नाटक करते रहे।

अहमदः आपको लग रहा था कि यह नाटक है?
अब्दुर्रहमान: खुली आंखों दिखाइ दे रहा था कि यह नाटक है।

अहमद: जब आपको लग रहा था यह नाटक है, फिर भी आप सब करते रहे?
अब्दुर्रहमान: असल बात यह थी कि मुझे इस्लाम के बारे में जरा भी मालूम नहीं था, अब यह जानने वाले थे तो फिर मुझे उनकी बात माननी थी, इस डर से कि कहीं मेरे इस्लाम में कोई कमी न रह जाए, मजहब के मामले में इन्सान अपनी अकल नहीं लडाता बल्कि वो अपनी अकल को मजहब के सुपूर्द करता है। मैं आपको एक लतीफा बताउं, पिछली इतवार को जब हम हजरत से मिलने आए थे, तो मुरादाबाद के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर साहब कलिमा पढने आए हुए थे, बहुत मुहब्बत और अकीदत से उन्होंने हजरत से कलिमा पढाने को कहा, हजरत ने उन्हें कलिमा पढवाया, हजरत ने कलिमा पढवाने से पहले कहा अपने मालिक को राजी करने के लिए और इस इरादे से कि मैं अपनी जिन्दगी अल्लाह के आखिरी कानून ‘‘कुरआन मजीद‘‘ को मान कर, और अल्लाह के आखिरी रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जो जिन्दगी गुजारने का तरीका बताया है उसके मुताबिक गुजरने के अहद अर्थात वादे की नियत से कलिमा पढ रहा हूं, पहले हम कलिमा अरबी में पढेंगे और फिर हिन्दी अनुवाद कहलवादूंगा, हजरत ने कहा जिस तरह मं कहूं कहिए, हजरत ने कलिमा कहलवाना शुरू किया ‘‘अशहदु अन्ला इलाहा इलल्लाह‘‘ यह कहते हुए हजरत के कान में खुजली आ रही थी, हजरत ने दायें हाथे से कान खुजलाया, तो प्रोफेसर साहब ने भी दायें हाथ से कान खुजलाया, हजरत ने कहलवाया ‘‘व अशहदू अन्ना मुहमदन अब्दुहू व रसूलू‘‘ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम , हजरत की नाक के उपर एक दाना सा हो रहा था, हजरत ने बाएं हाथ से नाक पर हाथ फेरा, प्रोफेसर साहब ने भी नाक को पकडा, हम सभी को हंसी आगयी, हजरत को भी हंसी आ गयी, प्रोफेसर साहब अजीब से हो गए, हजरत ने बताया कि असल में मेरे कान औरनाक पर खुजली आ रही थी, कलिमा पढते हुए किसी ऐक्शन की जरूरत नहीं, बल्कि अन्दर से यकीन और विश्वास की जरूरत है, प्रोफेसर साहब बोले कि मजहब का मामला है, धर्म में आदमी अपनी अकल को मालिक के हुकुम के सुपुर्द करने आता है, मैं यह समझा कि कान नाक पकड कर अहद (प्रतिज्ञा) करना है, इस लिए मैं ने ऐसा किया, हजरत साहब ने समझाया कि इस्लाम इलम और अकल को मुतमईन करने वाला मजहब है, अहमद साहब इस लिए में ने बावजूद यह कि मेरी अकल कह रही थी कि यह पीर बाबा का नाटक है, मगर वो जैसा कहते गए मैं ने किया, मुरीद होकर पहले हफते की नमाज, रोजा, इबादात की फीस दस हजार रूपए, और मिठाई के लिए दो सौ रूपए में ने एडवांस में पीर साहब को जमा करा दिए।

अहमदः माशा अल्लाह ऐसे मुरीद खरी फीस अदा करने वाले कहां किसी को मिलते होंगे इसके बाद आप माहाना जमा करत रहे?
अब्दुर्रहमान: मौलाना अहम! दस हजार तो जमा करता ही थी, इसके अलावा पीर साहब आंखें लाल पीली करके मुटठी भी खोलते थे कि आज तुम्हारे लिए शुशखबरी है, तुम्हारे दरजे आसमान की तरफ चढ रहे हैं, इसकी खुशी में फरिश्तों को मनाने के लिए अब इस चीज की जरूरत है। आठ साल हो गए इस्लाम कुबूल किए, ओसतन बीस हजार रूपए माहाना मैं ने पीर बाबा को जरूर दिए होंगे।

अहमदः इतने पैसे पीर बाबा को देते थे। आपका कारोबार क्या है?
अब्दुर्रहमान: मेरा एक महूर ब्यूटी पार्लर है, मैं और मेरी बीवी दोनों उस में काम करते हैं।

अहमदः इसमें इतनी आमदनी हो जाती है, आपकी फीस क्या है?
अब्दुर्रहमान: मालिक का करम है, काम बहुत अच्छा है, मेरी बीवी दुल्हन बनाने की फीस पचास हजार रूपए भी ले लेती हैं।

अहमदः तो पीर बाबा की क्या खता है। आप भी भरते के लिए लेते हैं, पीर बाबा भी रूप भरने के लिएण् ही लेते हैं।
अब्दुर्रहमान: बात तो आपकी ठीक है, जब मैं हजरत से पिछले दिनों बैत (भक्ति प्रतिष्ठा)  हुआ था तो हजरत ने मालूम किया था कि आप का कारोबार क्या है? मैं ने कहा कि ब्यूटी पार्लर है, तो हजरत ने फरमाया कि रोजगार पाक और हलाल होना चाहिए, मैं ने हजरत से कहा कि मैं आज से ब्यूटी पार्लर बंद कर दूं, हजरत ने फरमाया कि कोई अच्छा हलाल तैयब रोजगार तलाश करें, बिल्कुल हराम तो नहीं हां अच्छा नहीं, जब दूसरा रोजगार मिल जाए तो इसको छोड देना, हां अलबत्ता तब तक मुफती साहब का नाम बताया कि उनसे मालूम करें कि ब्यूटी पार्लर में क्या कर सकते हैं और क्या नहीं, इसका खयाल करें, मैं ने कहा कि हजरत मैं ने देवियों को राजी करने के लिए इतनी कुरबानियां दी हैं, मैं अपने अल्लाह को राजी करने के लिए आप से  (भक्ति प्रतिष्ठा) बेअत हुआ हू, अगर मेरे अल्लाह की रजा जान देने में है तो मैं जान देने के लिए तैयार हो कर आया हूं, आप मुझे बस हुकुम करें।

अहमदः हजरत से आप मुरीद हो गए, आप तो पहले पीर बाबा से मुरीद थे, अब दोबारा मुरीद कैसे हो गए?
अब्दुर्रहमान: असल में मैं तीन साल से हजरत से मिलना चाह रहा था हजरत को फोन करता था, पहले मिलता ही न था तो हजरत सफर पर होते, दस रोज पहले मैं ने फोन किया तो फोरन कहा कि मैं आठ साल पहले मुसलमान हुआ हूं, मुझे जिन मौलाना साहब ने हजरत का पता दिया था उन्हों ने कहा था कि अपना नाम बताने से पहले यह बता देना, फिर हजरत कहीं न कहीं मिलने की शकल बता देंगे। मैं ने जब कहा कि मैं तीन साल से आप से राबता करने की कोशिश कर रहा हूं, हजरत ने बहुत माजरत की और फरमाया कि इतवार के रोज ‘शाहीन बाग‘ आप आ जाएं, बहुत लोगों को मैं ने बुला लिया है, मगर फिर भी आप की जियारत हो जाएगी।
अहमदः हजरत का पता आपको किसने दिया था?

अब्दुर्रहमान: मुझे एक मौलाना साहब ने हजरत की किताब ‘‘आपकी अमानत आपकी सेवा में‘‘, ‘‘हमें हिदायत कैसे मिली‘‘ और ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ खरीद कर लाकर दी थी, मैं ने वो पढी, असल में मैं अपने पीर बाबा की मुसलसल ठगी और जुल्म से परेशान था, और मैं आठ साल तक इस मुरीदी से यह बात समझा कि मजहब के नाम पर शिर्क(अनेकश्वरवाद), धर्म के नाम पर सब से बडा अधर्म धार्मिक पंडितों ने कैसे चलाया, शिर्क के नाम पर लोगो को गुलाम बनाकर उनको ठगने का नाम शिर्क(बहीश्वरवाद) है, मजहब इन्सान की अन्दरूनी प्यास है, उसकी आत्मा यह मांगती है कि वो अपने खुदा को राजी करे उसके लिए उस से जो कुरबानी मांगी जाए इन्सान देता है, तकरीबन बीस हजार रूपए मेरी माहाना फीस के अलावा पीर बाबा ने मुझ पर न जाने क्या क्या जुल्म किए। मेरी लउकी बहुत खूबसूरत थी, इन्टर में पढ रही थी अचानक एक जुमेरात में मैं पीर बाबा के पास गया, हर जुमेरात को कुछ हदिया ले कर जाना पडता था, मैं पहुंचा तो पीर बाबा बहुत खुश थे, बोले अब्दुर्रहमान तेरे लिए मैं जो इबादत कर रहा हूं वो मालिक के यहां बहुत कुबूल हो रही है, पीर और मुरीद का रिश्ता तो आक़ा और गुलाम का होता है, मगर शायद तुझे अपने पीर के बराबर दरजा मिलने वाला है, आज उपर से मुझे इशारा हुआ है, अब्दुर्रहमान पहले ही तुम्हारा गुलाम है, मगर उसकी अकीदत हमें बहुत कुबूल है, अपने बेटे से उसकी बेटी और फिर अपनी बेटी से उसके बेटे की शादी करदो, यह एजाज़ बेटा तुम्हें मुबारक हो, तुम्हारी औलाद ने कैसा नसीब पाया है, पीर के बेटे और बेटी से आसमान से रिश्ता जुडवा लिया है, मैं ने कहा अगर मेरे मालिक का यह हुकुम है तो मैं हाजिर हूं, मैं घर आया अपनी बीवी से बताया, बच्चों से मशवरा किया, घर वाले तैयार नहीं थे, घर में मैं ने उनको मालिक के गुस्से से डराया, वहां से हुकुम हुआ है तो मानना चाहिए, मालिक ने औलाद दी है तो उसके हुकुम को मानना चाहिए।

अहमदः आपको यह बात ढोंग नहीं लग रही थी?
अब्दुर्रहमान: दिल में बात आई थी कि शायद यह भी नाटक और ढोंग है, मगर यह भी डर लगता था कि सचमुच मालिक का हुकुम होगा और न माना तो बर्बाद हो जाएंगे, कभी कभी दिल करता, फिर दिल को समझाता, अगर मेरे मालिक के नाम पर धोका है तो उसकी मुहब्बत में धोका खाना भी अच्छा है, बस इस लिए सब कुछ करते रहे।

अहमदः आगे क्या हुआ आप ने शादियां कर दीं?
अब्दुर्रहमान: मेरी लडकी छोटी थी और पीर बाबा की लडकी छ साल बडी थी, मगर उन्होंने कहा कि उपर से इशारा है कि पहले तुम्हारी लडकी की शादी हो, बीवी को खिदमत करनी पडती है, पहले पीर की लडकी से खिदमत कराना बे अदबी है, पहले अपनी बेटी को खिदमत के लिए पेश करो, शदी से पहले हमसे पीर बाबा ने कहा तुम मुरीद हो और में पीर हूं, अल्लाह की मुहब्बत में यह रिश्ता है, इसमें जो भी आप पीर बाबा को अपनी लडकी के जहेज में दोगे वो जन्नत में मिलेगा, मैं ने कहा अल्लाह की मुहब्बत में हर चीज मेरी जानिब से है, आप हुकुम करो, पीर बाबा ने कहा तुम्हारी बेटी मेवात आया जाया करेगी, उसके अलावा हमारे पास भी सवारी का साधन नहीं है, एक ए सी गाडी दो, मेरा मकान तुम्हारी लउकी के लायक नहीं है, मेवात में मकान दोबार बनवाना पडेगा, इसके अलावा और घर में जरूरत का सामान तुम्हारी बच्ची चाहे, हम तो फकीर आदमी हैं, हमारे पास तो बोरिए के अलावा कुछ भी नहीं, बहरहाल तकरीबन 28-29 लाख रूपए शादी में खर्च किए, एक साल बाद फिर मेरी लडकी की शादी का हुकुम उपर से आने की खबर दी, वो बोले तुम मुरीद हो मैं पीर हूं हम तुम्हें जन्नत और विलायत के दरजात जैसी कीमनी चीज दिलाते हैं, अगर मुरीद अपने पीर से जहेज वगेरा का मुतालबा करे तो मुरीदी टूट जाएगी, उनकी लडकी जो कपडे पहन कर आई सारे मैं ने ही बनाए, एक सूई भी वो जहेज में न लाई
अहमदः आप यह सब कुछ करते रहे आज कल अकल का जमाना है, और आप शहर के रहने वाले पढे लिखे ग्रेजवेट हैं, बच्चे पढे लिखे हैं, आपकी बीवी पढी लिखी हैं?
असल में दिल तो टूटता रहा, मगर बस वही बात कि मालिक के नाम पर धोका खाना भी एक मजा देता है, हम सब यह करते रहे।

अहमदः उन पीर साहब से अब भी ताल्लुक है?
अब्दुर्रहमान: असल में नव मुस्लिमों के इन्टरव्यू की किताब ‘‘नसीम-ए-हिदायत के झोंके‘‘ ने दिल तो हटा दिया था, मगर अब रिश्तों की वजा से जाहिरी तौर पर निभाते रहे। मगर अब जालिम ने मेरी बच्ची को सताना शुरू कर दिया है, पीर बाबा की बीवी ऐसी जालिम औरत है कि बस अल्लाह पनाह में रखे, अब उसके जुल्म से खुद उसका बेटा भी आजिज आ गया है, और उसने खुद से कहा कि इन धोकबाजों के चक्कर में न आएं। असल में अल्लाह ताला को हम पर तरस आया, उसके नाम पर धोका हमने चूंकि उसकी मुहब्बत में खाया था, इस लिए खुद पीर बाबा का बेटा हमारे लिए पीर बाबा के बन्धन से छुडाने का जरिया अना। पीर बाबा का बेटा जो हमारा दामाद है जावेद वो एक साथी के साथ हजरत से मिला, दूकान न चलने की शिकायत की, हजरत ने उसको किसी एक नमाज के बाद एक तस्बीह इस्तगफार और हर महीने में तीन दिन तीन महीने तब्लीगी जमात में लगाने का मशवरा दिया और फरमाया कि उम्मीद है कि इन्शा अल्लाह कारोबर चल जाएगा, वो नमाजें पढता था, उसने इस्तगफार नमाज के बाद पढने के लिए रात की नमाज ईशा पढना शुरू की और जमात में तीन रोज तीन महीन तक लगाए, तीसरे माह अमीर साहब ने चार माह का इरादा कर वा लिया, अल्लाह का शुक्र है वो जमात से जुड गया और वो आज हजरत से बेअत भी हुआ, उसने ज्यादा जोर दिया कि हम सब घर वाले हजरत से बेअत हो जाएं, यह अलग बात है कि अल्लाह ताला ने मुझे और मेरी बीवी को एक हफते पहले ही तौफीद दे दी, मेरी बीवी और बच्चे सब यह कह रहे थे कि डेडी असल में आज ऐसा लगा जैसे हम आजाद हो गए, हमारे घर में नव मुस्लिमों के इन्टरव्यू की किताब ‘‘नसीम-ए-हिदायत के झोंके‘‘ बहुत दिनो से बच्चे पढते हैं, मेरे दोनों बेटे उसके बाद से जुमेरात को मरकज भी जाने लगे हैं, अब मेरा भी जमात में वकत लगाने का इरादा है, हजरत ने भी मशवरा दिया है कि चार महीने लगा दूं।

अहमदः माशा अल्लाह वाकई आपकी बात भी खूब है कि आप को बंदर ने मुसलमान बना दिया है, अच्छा आपके इलम में है कि आपका यह इन्टरव्यू हमारे यहां मेगजीन ‘अरमुगान‘ में छपने के लिए है आप उसके पढने वालों को कोई सन्देश देगें?
पूर्व ब्रह्मण अब नव मुस्लिम अब्दुर्रहमान: मैं सन्देश या पैगाम क्या दे सकता हूं, सच्ची बात यह है कि मैं सिर्फ एक हफ्ते का मुसलमान हूं, मैं अपनी जिन्दगी के तजरबे से दो बातें कहता हूं कि बहेसियत मुसलमान हमारी जिम्मेदारी है कि हम शिर्क(अनेकश्वरवाद) के वास्ते से मजहबी गुलामी में जकडी इन्सानियत को एक अल्लाह के सामने खडा करके और उस सच्चे मालिक से जोड कर आजाद कराने की कोशिश करें। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो अल्लाह ताला मजलूम और सिसकती इन्सानियत के गले से शिर्क (अनेकश्वरवाद) के फंदे और बेडियां काटने के लिए बंदरों को भेज कर यह काम करा लेंगे,
दूसरी बात यह भी दिल में आई है कि अल्लाह की मुहब्बत में उसको राजी करने की नियत से इतना धोका खाने और कुरबानी देने के बदले में अल्लाह ताला ने हम पर तरस खाया और खुद पीर बाबा के बेटे को उस चंगुल से निकाला और हमें निकलवाया। तो अगर उसके नाम पर इस्लामी और शरई क़ायदों को जान कर कुरबानी दी जाएगी तो वो अल्लाह कितना नवाजेंगे, इसका अन्दाजा मुश्किल है।

अहमदः आपने अपने खानदान पर काम का कुछ इरादा किया, आपने हजरत से इस सिलसिले में कुछ नहीं कहा?
अब्दुर्रहमान: ऐसा नहीं होसकता, पहली मुलाकात में सबसे पहले हजरत ने यह कहा कि यह ईमान आपका जब ईमान है, जब यह यकीन हो कि ईमान के बगैर निजात मुक्ति नहीं, और जब यह यकीन है तो आप कैसे इन्सान हैं कि आपके सामने आपके भाई बहन रिश्ते दार बेकार नष्ट हो जाएं। और यह ईमान और बढेगा, जब आप सारी इन्सानियत की फिकर करेंगे और खास तौर पर रिश्तेदारों और खानदान वालों का और भी ज्यादा हक है। अलहम्दु लिल्लाह मैं ने इरादा ही नहीं क्या बल्कि बात करना शुरू कर दी है, आपसे दुआ की दरखास्त है कि अल्लाह ताला की हिदायत से हमारे सब रिश्ते दार इस्लाम में आ जाएं।

अहमदः आमीन, बहुत बहुत शुक्रिया, अस्सलामु अलैकुम
अब्दुर्रहमान: वालैकुम सलाम
........
साभार उर्दू मासिक पत्रीका ‘अरमुगान‘ जुलाई 2012

Urdu men idhar padhen
جناب عبد الرحمن سے ایک گفتگو
newmuslimsindia.blogspot.in/2012/06/new-muslim.html

नोटः लगभग 20 साल के ऐसे मासिक इन्टरव्यु ‘‘नसीमे हिदायत के झोंके‘‘ नाम से उर्दू के साथ साथ हिन्दी और इंग्लिश में भी छप चुके हैं।

Sunday, June 3, 2012

पूर्व शिव सैनिक मुहम्मद शकील (सुनिल जोशी) से एक मुलाकात interview

बजरंग दल के जिला संचालक के शिव सैनिक मित्र सुनिल जोशी जो अब नाम मुहम्‍मद शकील का उर्दू मासिक पत्रीका 'अरमुगान' जून 2012 ईं में मौलाना मुहम्‍मद कलीम साहब के सुपुत्र अहमद अव्‍वाह को दिया गया इन्‍टरव्‍यू interview साक्षात्कार

अहमद अव्वाह: अस्सलामु अलैकुम
मुहम्मद शकील: वालैकुम सलाम

अहमद: शकील साहब अबी ने कुछ दिन पहले हम लोगों को बताया था कि आपने हमारे एक जिम्मेदार साथी के साथ बहुत गुस्से का मामला किया था और गालियां वगेरा दी थी, और अब आपको अल्लाह ताला ने हिदायत से नवाज दिया, आपके इस गुस्से और नाराजगी के पीछे क्या बात है, हालांकि आपके खान्दान के मुसलमानों से ताल्लुकात भी रहे हैं।
शकील: मौलाना अहमद साहब असल में तो मेरे मालिक मुझ पर रहम आ रहा था, बस उसने जरिया बना दिया, वर्ना पिछले दिनों मुझ पर मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ जो भूत सवार था उसका आप तसव्वुर भी नहीं कर सकते।

अहमद : फिर भी जाहिरी तौर पर इस गुस्से की वजह क्‍या थी?
शकील : असल में हमारे यहां शाहआबाद आंध्रा के चार बच्चे मुसलमान हुए, चारों भाई बहन थे, जिस लडके के साथ वो आए थे उसने उनकी बडी बहन से शादी कर ली थी, हमारे जिले की शिव-सेना के जिम्मेदारों को मालूम हो गया तो उन्हों ने इलाके में बवाल खडा कर दिया, उस लडके के खिलाफ बच्चों को बहका कर मुसलमान बनाने का मुकदमा दायर कर दिया, और उसको जेल भेज दिया, अदालत में उन बच्चों ने साफ-साफ खुल कर बयान दिया कि हम अपनी मर्जी से मुसलमान हुए हैं, लडकी अभी 18 साल की नहीं हुई थी, असल में उसके पिता झांसी के पास किसी जगह रहते हैं , शिवपूरी कोई जिला है वहां पर उन बच्चों की सगी मां तो मर गयी थीं, वालिद ने एम. पी. में ही दूसरी शादी की, मां के रवैये से परेशान होकर यह बच्चे घर से भाग कर आ गए, स्टेशन पर उस लडके को यह चारों मिले, इसको तरस आ गया, ये उनको शाहआबाद ले आया, घर वालों ने मुखालफत की, मगर इस लडके ने इस लडकी से वादा कर लिया था इस लिए उससे शादी कर ली, बाद में अदालत और पुलिस ने इन बच्चों के पिता से राबता किया तो उनके बाप ने यह बयान दिया कि यह बच्चे मेरी मर्जी से मुसलमान हुए हैं, और मेरी मर्जी से मेरी बेटी ने शादी की है, इस पर हमारे यहां के शिवसेना वालों ने शिवपूरी के जिम्मेदारों से राबता किया और बच्चों के वालिद के खिलाफ बयान दिने पर जोर दिया और उनको तरह-तरह की धमकियां भी दीं, मगर वो किसी तरह खिलाफ बयान देने पर राजी न हुए, और कहते रहे कि इस देवता जैसे इन्सान ने उन बच्चों पर तरस खाकर हमदर्दी की और उसको निभाया, हम उसके खिलाफ बयान दें यह कैसा घोर अन्याय होगा, क्या में बिल्कु हैवान बन जाउं, जब वहां के शिव सैनिकों ने बहुत ज्यादा दबाव दिया तो उन बच्चों के बाप ने और उन बच्चों के साथ उनकी सौतेली मां अपने दो बच्चों के साथ मुसलमान हो गयी, इस पर पूरे इलाके की हिन्दू कमेटियों ने अपनी हार समझ कर एकजुट हो कर छानबीन शुरू की तो मालूम हुआ की इलाके में बहुत से लोग मुसलमान होते जा रहे हैं, इस पर खोद-कुरेद हुई तो पता चला कि संभल और उसके पास के कुछ कसबों में कुछ लोग यह काम कर रहे हैं, मेरे एक साथी बजरंग दल के जिला संचालक हैं अनिल कौशिक, वो मेरे पास संभल आए और उन्होंने संभल में शिवसेना और बजरंग दल के लोगों की मीटिंग की, और उस में धर्म बदलने को रोकने के सिलसिले में लोगों को गरमाया, में बचपन से बहुत जज्बाती आदमी हूं मुझे बहुत गुस्सा आया, और मैं ने इसके खिलाफ तहरीक चलाने का इरादा कर लिया, मेरे एक और साथी ने जो इस काम में बढ चढ कर हिस्सा लेने का वादा कर चुके थे, उन्होंने मुझे बताया कि असल में एक किताब हिन्दी में ''आपकी अमानत, आपकी सेवा में'' मौलाना कलीम सिददीकी साहब ने लिखी है, वो ऐसी जादू भरी भाषा में लिखी गयी है कि जो उसे पढता है मुसलमान हो जाता है, और वो दिल्ली से छपी है उस पर छपवाने वाले का फोन नम्बर है, मैं ने कहा वो किताब जरा मुझे ला कर दो, मैं देखूंगा उस में क्या बात लिखी है, उसने कहा नहीं उसका पढना ठीक नहीं है, उस किताब का लेखक कोई तान्त्रिक है, उसने उसकी भाषा में जादू कर दिया है, अगर तुम पढोगे तो मुसलमान हो जाओगे, मुझे भी डर लगा, जब मुझे किताब दिखाई तो मैं ने बिना खोले किताब के बेक टाइटिल पर छपे दो मोबाइल नम्बरों को नोट कर लिया फिर एक नम्बर पर बात की, पहले नम्बर पर एक साहब का फोन मिला वो बडे नर्म स्वभाव के थे, मैं उन्हें मां बहन की बडी गालियां देता रहा, और धमकियां देता रहा, मगर वो हंसते रहे और बोले आपकी गालियां कितनी मिठी हैं उनसे मुहब्बत की खुशबू आ रही है, रात को दूसरे नम्बर पर मैं ने बात की और बहुत सख्त सुस्त आखरी दरजे की मां बहन की सडी सडी गालियां देता रहा, तो वो साहब पहले तो गुस्सा हुए फिर बोले, मैं ने पूरा फोन टेप कर लिया है, अब आप के खिलाफ थाने में रिपोर्ट कराने जा रहा हूं, एक दफा तो मैं डर सा गया, फिर हिम्मत की और कहा कि कतल के बाद इकटठे ही केस कर देना, मैं ने उनसे कहा कि जरा अपनी पत्नि (बीवी) से बात करादे, मैं तुझे कतल करूंगा , तो वो विधवा हो जाएगी, मैं उससे पहले ही क्षमा (माफी) तो कर लूं, फिर तो मौका मिलेगा नहीं।

अहमद: अच्छा तो वो आप थे, अबी(कलीम साहब) तो बहुत मजे लेकर यह बात सुनाते थे, और उन साथी को समझाया था जब वो बहुत टूटे दिल के साथ उन गालियों की शिकायत कर रहे थे, अबी ने उनको समझाया कि तुम्हें तो फखर करना चाहिए, कि सैयदुल अव्वलीन व आखिरीन नबी रहमतुल आलमीन सल्ल. की सुनन्त अदा करने का शरफ तुम्हें मिला, दावत की राह में किसी खुशकिस्मत को ही गालियां नसीब होती हैं, अबी उनसे कहने लगे तुम बताओ कोई ऐसा खुशकिस्मत आदमी जिस को दावत(दीन की बुलाने) की राह में गालियां मिली हों, यह प्यारे आका की सुन्नत है कि जिनको दोजख की आग से निकालने के लिए आप रातों को रोते और दिनों को खुशामद करते थे, वो लोग गालियां देते, पत्थर बरसाते, और हर तरह से सताते थे, फिर उसने उनसे कहा कि तुम ने उसकी गालियों पर तो गौर किया, उसकी इन्सानियत और रहम दिली और उसकी मुहब्बत भरी फितरत का अहसास नहीं किया कि अभी उसने तुम्हें कतल किया भी नहीं और तुम्हरी बीवी से माफी मांगने को कह रहा है...... जी तो आगे सुनाइए।

शकील: उन साहब ने मुझसे मालूम किया कि आप यह बताइए कि उस किताब में कौनसी बात ऐसी गलत है जिस पर आपको एतराज और ऐसा गुस्सा है, मैं ने कहा, मैं ने तो वो किताब पढी नहीं, उन्होंने कहा फिर आपको गुस्सा क्यूं? मैं ने कहा मेरे कई साथियों ने किताब पढने से मना किया और कहा जो भी यह किताब पढता है इस किताब की की भाषा में जादू कर रखा है, वो मुसलमान हो जाता है, इस डर की वजह से मैं ने किताब नहीं पढी, उन्होंने कहा आपको किसी ने गलत कहा है? मुझसे पूछा आप कुछ पढे लिखे हैं? मैं ने कहा में एम. एस. सी. हूं, वो बोले साइंस के स्कालर होकर आप कैसी अंधविश्वास की बात कर रहे हैं, इन्सान को मालिक ने देखने के लिए अकल दी है, और आप इतने पढे लिखे आदमी हैं, इन्सान चांद तारों पर जा रहा है, और आप जादू की बात कर रहे हैं, आप ऐसा किजिए कि आप इस किताब को जरूर पढिए और इसके पढने के बाद जो बात आपको गलत लगे अपने कलम से काट दिजिए, आइन्दा आप जिस तरह करक्शन करेंगे किताब उसी तरह छपेगी, उन्हों ने कहा 'क्या में आपके पास किताब भेज दू?'' मैं ने कहा अगर मुझे न मिली तो मंगा लूंगा, और मुझे इस किताब में कोई बात हिन्दू धर्म के खिलाफ मिलेगी तो में तेरे पूरे खान्दान को कतल कर दूंगा, वो बोले कोई बात नहीं।

अहमद: उसके बाद आपने वो किताब पढी?
शकीलः नहीं मैं ने उन दिनों वो किताब नहीं पढी, साथियों से बात हुई तो मेरी तबियत में बहुत नर्मी देख कर वो बहुत गुस्से हुए, और बोले कि ऐसे ही तो लठ मार मार कर वो धर्मान्त्रण कर रहे हैं, देखा नहीं यह इसाई मिशन वाले भी ऐसा ही करते हैं में जगह जगह जाकर चौराहों पर इस किताब और उसके बांटने वालों को गालियां देता, संभल के नवाब खान्दान के एक साहब को हज के दिनों ही वहीं मालूम हुआ कि संभल के पास एक कस्बा में एक आदमी सुनिल जोशी नाम का ''आपकी अमानत'' के खिलाफ बहुत गुस्सा है, वो उसके लेखक को बहुत गालियां बकता है, मौलाना कलीम साहब से वो मुरीद(धर्म शिष्‍य) है, हज के सफर से आने के बाद वो तलाश करते करते मेरे पास पहुंचे, मुझे देखा तो चिमट कर बहुत रोने लगे, सुनिल भैया तुम तो मेरे साथ छटी क्लास से लेकर दस्वी क्लात तक पढे हो, तुम्हारे साथ मैं ने कबडडी भी खेली है, मैं ने भी पहचान लिया, मैं ने कहा कि मेरे पिताजी ने तो आपके अब्बा जान की जमीन भी काश्त की है, बोले हां हां वो जमीन तो पिताजी ने बहुत सस्ते दामों में आपके पिताजी को ताल्लुकात की वजह से बेच दी थी, मैं ने कहा हां तुम्हारे पिता जी तो हमारी शादी में बहुत बढ-चढकर शरीक हुए थे, और कई दिन तक काम कराया था बलिक एक तरह से शादी की जिम्मेदारी निभाई थी, यह कह कर वो मुझ से चिमट गए, बुरी बुरी तरह फूट फूट कर रोने लगे और उनका रो रोकर बुरा हाल हो गया, रोते रहे और कहते रहे मेरे लाडले दोस्त, ईमान के बगैर तुम मर गए तो दोजख में जलोगे, मैं ऐसे अच्छे दोस्त को कैसे दोजख में जाता देखूंगा, मेरे भाई सुनिल मैं ने इस बार हज में बार-बार तुम्हारी हिदायत के लिए दुआ की है, मेरे भाई ईमान के बगेर बडा खतरा है और बहुत खतरनाक आग है, मेरे भाई सुनिल नर्क की आग से बच जाओ, जल्दी से कलिमा पढ लो, देखो में दिल का मरीज हूं तडप तडप कर मेरा हार्ट फेल हो जाए गा, मैं ऐसे अच्छे दोस्त को हर्गिज कुफर पर मरने नहीं दूंगा, मेरे भाई कलिमा पढ लो, फूट फूट कर आवाज से रोते रोते उनका बुरा हाल हो गया, मैं ने कहा ''में कलिमा पढ लूंगा, तुम चुप हो जाओ, मेरे यार चाए तो पी लो'' वो बोले ''मैं किस दिल से चाए पी लूं, जब मेरा दिली प्यारा दोस्त, जिसका इतना प्यारा बाप हो, जो मरे हकीकी भाई की तरह होने के बावजूद ईमान के बगैर मर गया, सुनिल भैया चचा बलराम जी पर नर्क में क्या क्या गुजर रही होगी, मेरे अब्बा ने उन्हें मरने दिया गमर में तुम्हें हरगिज अब नर्क में नहीं जाने दूंगा'' बार बार मैं उनको पानी पिलाने की कोशिश करता, मगर वो कहते ''तुम्हें पानी की पडी है, मेरा भाई मेरा दोस्‍त सुनिल बगैर इमान के मर जाएगा, मेरे होश खराब हो गए, मैं ने कहा: ''चुप हो जाओ पानी पी लो, जो तुम कहोगे, मैं करने को तैयार हूं'' वो बोले ''कलिमा पढ लो'', मैं ने कहा कि तुम पानी पीलो, मैं कलिमा नही पूरा कुरआन पढ लूंगा'' वो बोले ''अगर मेरे पानी पीते पीते तुम मर गए तो नर्क में जाओंगे'' मैं ने कहा ''मेरे भाई , अच्छा तुम पढाओ क्या पढाते हो'' मैं ने उनकी हालत बुरी देखी तो उसके अलावा और कोई रास्ता दिखाइ नहीं दिया, उन्होंने रोते रोते मुझे कलिमा पढाया, फिर हिन्दी में उसका अनुवाद बताया, मैं ने उनको पानी पिलाया, मैं ने कहा ''अच्छा अब तुम खुश हो अब चाए पी लो'' उन्हों ने चाए पी, और जेब में से ''आपकी अमानत आपकी सेवा में'' किताब निकाल कर दी, कि सुनिल भैया इस किताब को अब तुम दो बार बहुत गौर से पढना, 'आपकी अमानत' मैं ने देखी तो मेरा मूड खराब हो गया, अच्छा यह किताब तो मैं किसी तरह भी नहीं पढूंगा, इस किताब के लेखक को मैं ने कतल करने का पर्ण (अहद) किया है, वो चाए छोड कर फिर मुझ से चिमट गए और रोने लगे, मैं ने कहा ''तुम कुछ ही करो, मैं किताब नहीं पढ सकता'', वो बोले क्यूं इस किताब से तुम्हें ऐसी चिड है, मैं ने कहा, क्या तुम ही लोग यह किताब बांट रहे हो, उन्होंने कहा कि तुम्हरा यह गया गुजरा भाई ही यह मुहब्बत की खुशबू बांट रहा है'' मैं ने कहा ''मुहब्बत की नहीं नफरत की, इस किताब के नाम से मुझे गुस्सा आता है, वो बोले कि भाई सुनिल, इस किताब में क्या बात गलत है? तुम ने यह किताब पढी है? मैं ने कहा मैं नहीं पढ सकता, इस किताब का लेखक तान्त्रिक है उसने इसके शब्दों में जादू कर रखा है, वो दिलों को बांध देते हैं'' वो फिर पहले की तरह रोने लगे, सुनिल भैया ''इस किताब का लेखक एक तान्त्रिक नहीं, एक सच्चा इन्सान और मुहब्बत का फरिश्ता है, उसने इस किताब में मुहब्बत की मिठास घोल रखी है, और इस किताब में सच है, सच्ची हमदर्दी है, वो यह कहते हैं कि हर इन्सान की आत्मा सच्ची होती है, वो अपने मालिक की तरफ से सच्ची बात पर कुरबान होती है, मेरे दोस्त तुम्हें यह किताब जरूर पढनी पडेगी'' मैंने कहा कि सब कहते हैं जो इस किताब को पढता है वो मुसलमान हो जाता है, मुझे यह डर है कि इस किताब को पढ कर मुझ सचमुच मुसलमान होना पडेगा'' यह कहना था कि वो मुझसे चिमट गए, और बच्चों की तरह बिलक बिलक कर रोने लगे, मेरे भाई सुनिल, तुमने सच्चे दिल से कलमा नही पढा, झूठे दिल से पढा कलमा किसी काम की नहीं, मरे भाई तुम्हें यह किताब पढनी पडेगी, में हरगिज हरगिज तुम्हें नरक में नहीं जाने दूंगा, मेरे भैया में मर जाउंगा, मुझ डर लगा कि यह वाकई  रो रो के मर जाएगा, मैं ने उसको पानी पिलाना चाहा, वो पानी पीने को तैयार न हुए, मैं ने कहा ''मेरे बाप में इस किताब को दस दफा पढूंगा तुम चुप हो जाओ, अच्छा यह पानी पी लो, मैं तुम्हारे सामने अभी पढता हूं'' उसने इस शर्त पर पानी पिया, कि मैं अभी इस किताब को पूरी उसके सामने पढूंगा, मैं ने उनके सामने किताब पढना शुरू की, और खयाल था कि थोडी देर में यह चुप हो जाएगा तो यह किताब बंद कर दूंगा, मगर जैसे ही पेश लफज (दो शब्द) का पृष्ठ पढा, किताब के लेखक से मेरी दूरी कम हो गई, और फिर मैं किताब पढता गया, 32 पृष्ठ की किताब आधे घंटे में खतम हो गई, इस किताब का सच और मुहब्बत मेरे उपर जादू कर चुका था, मैं ने अपने दोस्त से एक बार सच्चे दिल से कलिमा शहादत पढाने की खुद रिक्वेस्ट की, उन्होंने मुझे कलिमा पढाया, मैं ने गले मिलकर उनका शुक्रिया अदा किया, और अपना नाम उनके मशवरे से शकील अहमद रखा

अहमद: इसके बाद आपने अपने इस्लाम का एलान किया?
शकील: रात को मैं ने अपनी बीवी से बताने का इरादा किया, बाजार से उसके लिए जोडा लिया, और एक चांदी की अंगूठी खरीदा, एक मिठाई  का डब्बा लिया, 30 मार्च का दिन था, यह मेरी शादी का दिन था, और यह दिन मेरी बीवी का बर्थडे भी था, रात को मैं ने उसको मुबारकबाद दी और हद दरजे मुहब्बत का इजहार किया जो मेरी आदत के बिल्कुल खिलाफ था, वो हैरत से मालूम करने लगी की यह किया बात है, मैं ने कहा कि एक आदमी सुनिल जो तुम्हारे साथ भारतीय समाज के मुताबिक पांव की जूती समझ कर व्यवहार सलूक करता था, आज उसने नया जन्म लिया है, उस पर उसके मालिक ने महरबानी कर दी हे, उसे धार्मिक बना दिया है, एक प्रेम का देवता मेरे पास आकर मेरी जीवन के अंधकार को प्रकाशित कर गया गया, मैं तुम से आज तक के सारे अत्याचार जुल्म के लिए पांव पकड कर माफी मांगता हूं, और आइन्दा के लिए तुम से वादा करता हूं कि तुम मेरी जीवन साथी, मेरे सर का ताज हो, वो बोली में समझ नहीं सकी, मैं ने कहा इसको समझने के लिए अगर तुम्हारे पास समय है तो आधा घंटा चाहिए, मगर जब तुम खुशी से तैयार हो, मैं तुम पर जबरदस्ती बहुत कर चुका, अब मुझे न्याय दिवस अर्थात उपर वाले को हिसाब देने का दिन का डर हो गया है, तुम्हारे पास जब खुशी से समय हो मैं एक पाठ तुम्हें सुनाना चाहता हूं, वो बोली, ऐसी अदभूत हैरतनाक तब्दीली के लिए मैं सुनने को तैयार हूं, वो कौन सा पाठ है जिसने आपके ऐसा बदल कर रख दिया, मैं ने जेब से 'आपकी अमानत' पुस्तक निकाली, वो बोली '' यह किताब में खुद भी पढ सकती हूं क्या?'' मैं ने कहा मेरा दिल चाहता है मैं खुद ही सुनाउं, असल में मेरे दिल में यह बात आ गई कि 17 साल में ने तुम्हारे साथ इतनी सख्ती और जुल्म किया, एक ऐसा अहसान कर दूं, जो 17 साल का अन्याय ना इन्साफी धुल जाए, कि हमेशा अजाब से तुम बच जाओ'' एक बार सुनने के बाद वो बोली अच्छा अब एक बार उसको जरा समझ कर पढना चाहती हूं, मैं ने कहा जरूर पढो, वो किताब उसने ली, पूरी किताब एक अलग जाकर उसने पढी, फिर मेरे पास आई और बोली इसका मतलब तो यह है कि सनातन धर्म और सच्च मजहब सिर्फ इस्लाम है, मैं ने कहा मालिक ने तुम्हें बिल्कुल सच समझाया, मेरी अचानक तब्दीली से वो बहुत मुतासिर थी, 17 साल से पहली बार मैं ने उसको प्यार से गले लगाया था, उसको प्यार किया था मुहब्बत से कुछ खरीद कर उसको पेश किया था उसके जन्म दिन और शादी के दिन पर मुबारकाद दी थी, अब उसके लिए मेरी बात मानना बिल्कुल स्भाविक (फितरी) था, मैं ने 'आपकी अमानत' पुस्‍तक में देख कर उसको कलिमा पढवाया(‘‘अशहदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अशहदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलूहसल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम‘‘), उसका नाम आमिना खातून रखा, अपने दोनों बच्चों को भी कलिमा पढवाया, उनका नाम फातिमा और हसन रखा।

अहमद : इसके बाद आपने आम एलान किया?
शकील: अभी तक आम एलान नहीं किया, अलबत्ता चार पांच रोज के बाद तुम्हारे यहां एक मौलाना साहब जिनके बारे में मुझे मालूम हुआ था, ''आपकी अमानत'' बांटते हैं, उनको मैं ने एक दिन खरी खरी गालियां सुनाई थीं, उनके पास गया और उनसे अपने मुसलमान होने के बारे में बताया, और उनसे अपनी खतना के सिलसिले में मशवरा किया, मगर उनको यकीन रहीं आया, और जरा टालते रहे, मैं उनके डर को समझ गया,और में मुरादाबाद एक मुसलमान डाक्टर के पास गया, और जाकर खतना कराई, उसके बाद मैं ने तीन बार सिर्फ तीन तीन दिन गजरोला तब्लीगी जमात में लगाए।

अहमद: गजरोला के साथियों को मालूम था कि आपने इस्लाम कुबूल किया है?
शकील: मैंने बताया कि असल में मैं पैदाइशी मुसलमान था बाद में शिव सेना और बजरंग दल के चक्कर में हिंदू बन गया था और यह बात सच्ची थी, हर पैदा होने वाला इस्लाम पर पैदा होता है, अब मेरा इरादा पहले चार महीने तब्लीगी जमात के सफर में लगाने का है, उसके बाद खुल कर एलान करूंगा, और इन्शा अल्लाह दीन सीख लूंगा तो दूसरों को दावत देना आसान होगा।

अहमद: माशा अल्लाह, अल्लाह ताला मुबारक फरमाए, वाकई आपका रईमान अलाह की खास हिदायत की कारफरमाई है, अच्छा आप मासिक 'अरमुगान'  www.armughan.in  के पाठकों को कुछ पैगाम देंगे?
शकील: दो रोज पहले बदायूं में हजरत तकरीर कर रहे थे कि तमाम मुसलमानों को अल्लान दे दाइ अर्थात अल्लाह की और बुलाने वाला बनाया है, दाइ(दीन की दावत देने वाला) की हैसियत डाक्टर जैसी और जिसको दावते दीन दी जाए उसकी हैसियत मरीज (बीमार) की है अगर डाक्टर अपने मरीज के इलाज में कोताही करें और मरीज मरने लगें तो मरीज का गुस्सा होना बिल्कुल नेचुरल है, मगर डाक्टरों को अपने मरीज से निगाह नहीं फेरनी चाहिए, दावते दीन असल में मुहब्बत भरा काम हैं, यह डिबेट मुनाजरा नहीं, कि हारजीत की बात बनालें, यह तो नबवी दर्द के साथ अपने मदउ अर्थात जिसे दावत दी जानी है उसके लिए अजाब के खतरे को समझ कर कुढने और तडपने का अमल है, अगर सच्चे दर्द और तडप के साथ कोई रोने वाला हो, मुझ जैसे जलाली और गुस्सावर, कतल और गालियों पर आमादा दरिन्दे को जिसको कभी अपनी बीवी बच्चों पर प्यार न आया हो, उसको पिघला कर अल्लाह का बंदा और गुलाम बनाया जा सकता है, इमान कुबूल करने के बाद जैसे सुनिल जोशी गुसियारा दरिन्दा मर गया और मुहम्मद शकील एक कोमल दिल वाले इन्सान ने जन्म ले लिया, मेरे साथ  ऐसा हुआ है, असल में दर्द और खेरखाही की जरूरत है।

अहमद: वाकई बहुत गहरी बात आपने कही, बहुत बहुत शुक्रिया  जज़ाकल्लाह, आप खूब समझे, अस्सलामु अलैकुम
शकील: मैं नहीं समझा, एक रोने वाले ने समझा दिया, आपका बहुत बहुत शुक्रिया , वालैकुम सलाम
 -----------------------------------------------------------------------
"aapki amanat aapki sewa men" in English
 By
Muhammad Kaleem Siddiqui
 
Translation: Safia Iqbal


 -----------------------------------------------------------------------
Maulana Kaleem Siddiqui यादगार विडियो
Part-1
http://www.youtube.com/watch?v=UmNIaIjgq8Q&feature=mfu_in_order&list=UL
Part-2
http://www.youtube.com/watch?v=uBLctMHjhWo&feature=related
Part-3
http://ww.youtube.com/watch?v=b21jKsdIbU4


Wednesday, March 30, 2011

मसऊद अहमद से मुलाकात interview april 2011

अहमदः अस्सलामु अलैकुम रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मसऊदः वालैकुम सलाम वरहमतुल्लाहि वबरकातुह


अहमदः आपके साथ दो साथी भी आये हैं, इनका तार्रुफ कराईये?
मसऊदः यह दोनों मेरे दफ्तर के साथी हैं, हमारे साथ गुडगांव में अमरिकी कम्पनी में मुलाजमत करते हैं, इनमें से यह पहले साहब, इनका नाम संजय कौशिक था, इनका नया नाम सईद अहमद है, और यह दूसरे अनुपम गुलाठी थे, अब मुहम्मद नईम इनका नाम है, दोनों साफ्टवेयर इन्जीनियर हैं, दोनों ने आई.आई.टी रूडकी से बी.टेक किया है, हम लोग रूडकी में साथ पढ़ते थे, तीनों दोस्त हें, अब इन्शाअल्लाह जन्नत में साथ जाने की तमन्ना है, जो बजाहिर अल्लाह ने चाहा तो पूरी होती दिखायी दे रही है।
यह दोनों जमात में वक्त लगा कर आ रहे हैं, इनका चिल्ला आदिलाबाद में लगा, वहाँ पर इन्होंने हजरत का और भी तार्रुफ सुना तो बहुत बे-चैन थे कि हजरत से मुलाकात हो जाये, मेरी भी खाहिश थी कि मुलाकात हो जाये, वह लोग बेअत होने के लिए आये थे, अब चूंकि हजरत बिल्कुल दावत पर बैअत लेने लगे हैं, इस लिए नये इरादे से जा रहे हैं।


अहमदः इन को दावत देने में आपको कोई मुश्किल तो नहीं आयी?
मसऊदः मुश्किल तो नहीं कह सकते, अलबत्ता दो साल लगातार दुआयें करनी पडीं। असल में इनको जब भी इस्लाम के बारे में बताता, या कोई किताब पढ़ने को कहता तो यह मेरा मजाक उड़ाते, यह कहते कि हमारे लिए कौन-सी कश्मीरी लड़की तुमने तलाश कर रखी है जिसके लिए हम  मुसलमान हों, मेरी बदकिस्‍मती या खुश किस्‍मती है जैसा कि शायद आपको हजरत ने बताया होगा कि मेरे इस्लाम कुबूल करने का जरिया जम्मू की एक लड़की से ताल्लुकात और शादी हुई, यह जरिया जाहिर है किसी दूसरे के लिए इस्लाम में दिलचस्पी का जरिया नहीं हो सकता, तो मैं जब भी इन दोस्तों को लेकर बैठता यह मेरा मजाक  बनाते, इनको नॉनवेज(गोश्त) खाने का बहुत शौक है, दावत के बहाने, में इनको करीम होटल जुमेरात को ले जाता, और मर्कज ले जाकर तकरीर  सुनवाता, यह मेरा मजाक बनाते, मर्कज का भी मजाक उडाते, एक बार इन्होंने हजरत मौलाना साद साहब का बहुत मजाक बनायी और तीन-चार रोज उनकी नकल उतारते रहे, एक-एक जुमले को दो-दो तीन-तीन बार कहते, मुझे देखते ही कहले लगते आओ मौलाना साहब की तकरीर सुनो, मुझे बहुत तकलीफ होती, मैंने इनसे बोलना छोड दिया, उन दिनों मैंने बहुत दुआयें कीं, अपने अल्लाह के सामने बहुत फरियाद की, मेरे अल्लाह को मुझ पर तरस आगया, एक हफ्ते से ज़्यादा बोल-चाल बंद रही, फिर यह दोनों मेरी खुशामद करने लगे, जब एक रोज बहुत खुशामद की और मुझ से बहुत माफी मांगी तो मैंने कहा मैं तुम से इस शर्त पर बोलूंगा जब तुम दोनों तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ने का वादा करो, वह तैयार हो गये, असल यह है अहमद साहब, अल्लाह के यहाँ से फेसला हो गया था, मेरे अल्लाह को मुझ गंदे पर तरस आ गया और फेसला हो गया, बस इन्होंने तीन-तीन बार ‘‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’’ और ‘‘मरने के बाद किया होगा?’’ पढ़ी और खुद ही इस्लाम कुबूल करने को कहने लगे, मैं ‘दारे अरकम’ आया, इत्तफाक से ‘दारे अरकम’ में कोई नहीं मिला, मस्जिद में हम लोगों ने दोपहर से शाम तक इन्तजार भी किया, फिर मैं इनको लेकर अगले रोज इतवार था, जामा मस्जिद दिल्ली चला गया, वहाँ मौलाना जमालुद्दिन साहब तफसीर ब्यान करते हैं, उन्होंने इनको कलमा पढवाया, कुडकरडूबा कोर्ट में मेरे एक दोस्त वकील हैं, उन्होंने इनके कागजात बनवाये, दूसरे हफ्ते इन्होंने छुट्टि ली और जमात में वक्त लगाया, मुझे ऐसा लगता है और मैं इनसे कहता हूं कि मुझे इस का अन्दाजा अब हुआ कि मुझे अपने इस्लाम कुबूल करने की इतनी खुशी नहीं हुई जितनी इन दोनों दोस्तों के इस्लाम लाने की खुशी हुई, कई बार दफ्तर से रूखसत होते तो इतनी बेचैनी हो जाती थी कि अगर मेरा रास्ते में एक्सीडेंट हो गया या इनमें से कोई आज ही मर गया तो क्या होगा, और मैं रात भर नहीं सो पाता, देर हो जाती तो उठता, वुजू करता, नमाज पढ़ कर घंटों-घंटों रोता रहता, अखबार पढता जगह-जगह हादसे, एक्सीडेंट, मौत की खबरें और भी बेचैन कर देतीं, मेरे अल्लाह का करम है कि उसने यह खुशी दिखायी और इन्हें जमात बहुत अच्छी मिली, माशाअल्लाह दोनों पाबंदी से तहज्जुद पढ़ रहे हैं और अब दावत का बहुत जज़्बा उनमें पैदा हो गया है।


अहमदः आप तीनों गुडगांव में मुलाजमत पर साथ लगे थे?
मसऊदः नहीं! पहले संजय कौशिक की नोकरी लगी, फिर इनकी कोशिश से हम दोनों भी इस कम्पनी में मुलाज़िम हो गये, रहना-सहना भी साथ ही साथ रहा है।


अहमदः आपकी तो शादी हो गयी है, आप अब भी साथ ही रह रहे हैं?
मसऊदः हम तीनों जिस फ्लैट में रह रहे थे, मेरी शादी के बाद इन दोनों ने मेरे बराबर में एक दूसरा फ्लैट ले लिया है, पुराना फ्लैट जरा अच्छा था, वह उन्होंने मेरे लिए छोड दिया है।


अहमदः अबी (मौलाना कलीम सिद्दीकी) बता रहे थे कि आपके ससुराल वाले सब बिदअती थे, अल्लाह ने आपके जरिये उनकी इस्लाह की है, जष्रा इसकी तफसील बताईये?
मसऊदः असल में, मैं जिस कम्पनी में काम करता हूं, वहां एक कश्मीरी जम्मू की रहने वाली लडकी आसिफा बट भी काम करती थी, इस से मेरे ताल्लुकात हो गये, बात जब बढ़ी तो शादी के लिए आसिफा ने मना कर दिया कि तुम हिन्दू हो मैं तुम से शादी नहीं कर सकती, मेरे लिए इस लडकी को छोडना मुश्किल था, मैं बहुत ग़ौर करता रहा, मेरे खानदान का हाल भी ऐसा नहीं थी कि मैं लडकी के लिए मुसलमान होता, मैं छुट्टि लेकर बनारस अपने घर गया कि देखूं घर वालों की राय क्या है? मगर वह बनारस के ब्रहम्‍न, उनके लिए तो नाम लेना भी जुर्म था, दो महीने में बनारस रहा, मेरे दिल  में वह लडकी जगह कर चुकी थी कि इस के बगै़र दो महीने मेरे लिए दो सौ साल लगे, मैं गुडगांव आया और मैं ने फेसला किया कि घर वालों की मर्ज़ी के बगै़र मुझे इससे शादी करनी है, और एक रोज़ मैं ने आसिफा से मुसलमान होकर शादी करने के लिए कह दिया, उसने अपने वालिद से मिलने के लिए कहा, उसके वालिद लाजपत नगर में शालों का कारोबार करते हैं, मैं उनसे मिला, उन्होंने कहा, तुम मुसलमान हो जाओ, एक-दो महीने हम देखेंगे, इतमीनान हो जायेगा तो शादी कर देंगे, हमारे जानने वालों में एक लड़की के साथ एक लड़के ने मुसलमान होकर शादी की थी, मगर दो साल बाद वह फिर हिन्दू हो गया, मैं ने कहा मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूं।
वह बोले अजमेर शरीफ चलेंगे, तुम वहां चल कर मुसलमान हो जाना, मैं उनसे तकाजा करता रहता था मगर उनको मसरूफियात की वजह से वक्त नहीं मिलता थी, दो महीने के बाद एक इतवार को हम शताब्दी से अजमेर गये, वहां जाकर एक सज्जादा साहब से मिले, मोटी-मोटी मूंछें, काली मखमल की टोपी, क्लीन शेव, पाजामा जमीन में झाडू देता हुआ, एक साहब अपनी दूकान के काउन्टर पर बिराजमान थे, न जाने क्या नाम था चिश्ती कादरी साहब, हमारे ससुर जिनका नाम मन्‍जूर बट है, उनके पास गये, उनकी खिदमत में मिठाई पेश की, कुछ नकद नजराना भी दिया और आने की गर्ज भी बतायी, उन्होंने पांच हजार रूपये खर्च बताया, फूल और चादर अलग से खरीदने के लिए कहा। मुझे मेरे सर पर फूलों की टोकरी और चादर रख कर अन्दर ले कर गये, मजार की दीवार से लगा कर कुछ मुंह-मुह में कहा, और यह भी कहाः या खाजा आप का यह गुलाम हिन्दू मजहब छोड कर इस्लाम कुबूल कर रहा है, इसको कुबूल फरमा लिजिए और इसके अन्दर का कुफ्र निकाल दिजिए, चादर और फूल चढ़ाये ओर मुझे पांव की तरफ सजदे में पडने के लिए कहा, मैं सजदे में पड गया और मेरे साथ मेरे ससुर मन्‍जूर साहब भी, कादरी साहब ने बाहर निकल कर मुबारक बाद दी की खाजा साहब ने आपका इस्लाम कुबूल कर लिया, मैं ने उनसे कहा कि खाजा साहब ने इस्लाम कुबूल कर लिया, तो अब मुझे इस्लाम के लिया क्या करना है? बोले बेटा तुम्हारा इस्लाम खाजा ने कुबूल कर लिया, तुम वाकई सच्चे दिल से इस्लाम में आये थे, वहां तो दिल देख कर कुबूलियत होती है, मैंने अपने दिल में सोचा कि मैंने सच्चे दिल से कहां इस्लाम का इरादा किया है?


अहमदः क्या आप ने उस वक्त इस्लाम कुबूल करने का दिल से इरादा नहीं किया था?
मसऊदः नहीं मौलाना अहमद साहब! सच्ची बात यह है कि मैं ने सिर्फ उन लोगों के इतमीनान और शादी के लिए इस्लाम कुबूल करने का ड्रामा किया था, और मेरे दिल में यह बात थी कि बाप दादाओं का धर्म कोई छोडने की चीज होती है किया?


अहमदः आप अजमेर कुछ रोज रहे या वापस चले आये?
मसऊदः उसी रात को बस से दिल्ली आ गये, मैं ने आसिफा से शादी का मुतालबा किया तो उसने बताया कि हमारे वालिद साहब अभी मुतमईन नहीं हैं, अभी देख रहे हैं।


अहमदः आपने कुछ नमाज वगैरा पढनी शुरू कर दी थी?
मसऊदः तीन-चार बार जुमे की नमाज उनको दिखाने और इतमीनान कराने के लिए पढी, असल में नमाज तो आसिफा के घर वाले भी नहीं पढ़ते थे, उसके तीन भाई और एक बहन, मां-बाप मैं से कोई भी नमाज नहीं पढ़ता था, बस अजमेर शरीफ साल में दो बार जाते और निजामुद्दीन अन्दर दरगाह में एक महीने में दो बार जाते थे, और जम्मू में कुछ दरगाहें थीं वहां भी जाते, इसी को इस्लाम समझते थे, उनके एक पीर थे खानदानी, जो साल में एक दो बार उनसे नजराना लेते थे और कहते थे कि मैं तुम सब की तरफ से नमाज भी पढ़ लेता हूं और रोज भी रख लेता हूं।


अहमदः फिर शादी किस तरह हुई?
मसऊदः शादी अभी कहां हुई, असल में उनके दोस्त की लडकी के साथ हादसा हुआ था कि उस लडकी से जिस लडके ने मुसलमान होकर शादी की थी, वह शादी के बाद उस लडकी को होली, दीवाली मनाने को कहता था, और न मानने पर मारता था, बात बन न सकी, वह हिन्दू तो था ही, फिर उसे छोड कर अपने खानदान में चला गया, इस लिए आसिफा के वालिद डरते थे, वह लोगों से मशवरा करते, लोग उनको शादी न करने की राये देते, मगर वह मेरे ताल्लुकात के हद से ज़्यादा बढने के बारे में जानते थे, उनके किसी साथी ने उन्हें कश्मीर में मुफ्ती नजीर  अहमद से मशवरा करने के लिए कहा, मुफ्ती नजीर अहमद साहब कश्मीर के बडे मुफ्ती हैं, बांडीपूरा कोई बडा मदरसा है वहां मुफ्ती आजम हैं, उन्होंने किसी से उनका फोन नम्बर लिया और उनसे मशवरा किया, और बताया कि अजमेर शरीफ जाकर हम इस लडके को मुसलमान करवा लाये हैं, और खाजा ने इस्लाम कुबूल कर लिया है, मुफ्ती साहब ने कहा खाजा ने तो कब का इस्लाम कुबूल किया हुआ है, वह लडका अगर इस्लाम कुबूल न करे तो लडकी का निकाह ही नहीं होगा, मुफ्ती साहब ने उन्हें ‘दारे अरकम’ का पता दिया, और हजरत मौलाना कलीम साहब से मिलने का मशवरा दिया, मन्‍जूर साहब कई बार ‘दारे अरकम’ और खलीलुल्लाह मस्जिद आये मगर मुलाकात न हो सकी, इत्तफाक से दारे अरकम में कोई न मिला, बटला हाऊस मस्जिद में कोई अब्दुर्रशीद दोस्तम नव-मुस्लिम हैं, उनसे मन्‍जूर  साहब की मुलाकात हो गयी,  उनसे बात हुयी, अब्दुर्रशीद साहब ने बताया कि हजरत तो एक हफ्ते के बाद सफर से आयेंगे, मौलाना ओवेस और मौलाना उसामा नानोतवी भी नानोता गये हैं, आप ऐसा करें उनसे मुझे मिला दें, अगले रोज इतवार था, लाजपत नगर अब्दुर्रशीद दोस्तम ने आने का वादा किया, मेरी उनसे मुलाकात हुयी, उन्होंने इस्लाम के बारे में समझाया और कलमा पढवाया और मुझे और मेरे ससुर मन्‍जूर बट साहब दोनों को जोर  देकर कहा कि जमात में वक्त लगवा दें, मेरे कागजात सरफराज साहब एडवोकेट से बनवाये, और मुझे मर्कज जाकर डॉक्टर नादिर अली खां से मिल कर जमात में जाने को कहा, मेरे ससुर को बहुत समझाया अगर आप अपनी बची की जिन्‍दगी को तबाह होने से बचाना चाहते हैं कि यह शादी के बाद दोबारा हिन्दू न हों तो कम से कम चालीस रोज वरना अच्छा तो यह है कि चार महीने जमात में लगवा दें, वह बोले कि यह वहाबी हो जायेगा तो न हिन्दू रहेगा न मुसलमान, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब ने समझाया कि जमात वाले किसी का मसलक नहीं बदलवाते, जो हन्फी हैं वह हन्फी रहते हैं, जो शाफई हैं वह शाफई रहते हैं, और अहले हदीस, अहले हदीस रहते हैं। वहां सिर्फ फजाईल ब्यान किये जाते हैं, मसाईल अपने मसलक के मुताबिक लोग अपने आलिमों से पूछते हैं, बात उनकी समझ में आगयी और उन्होंने मुझे जमात में जाने के लिए कहा, चालीस रोज मेरे लिए बडी मुश्किल बात थी मगर वह अड़ गये, बोले जब तक तुम जमात में चिल्ला नहीं लगाओगे शादी नहीं होगी, मैं ने छुट्टि ली और मर्कज अपने ससुर के साथ गया, डॉक्टर नादिर अली खां साहब के कमरे में ऊपर जाकर उनसे मिले, उन्होंने मशवरा दिया पहले आप मौलाना कलीम साहब से मिलें, हमने बताया बहुत कोशिश के बावजूद नहीं मिल सके, अब्दुर्रशीद दोस्तम साहब से मुलाकात हुयी उन्होंने जमात में जाने का मशवरा दिया है, अलीगढ़ के एक पुराने उस्ताद जमात लेकर हेदराबाद जा रहे थे, उनके साथ जमात में जुडवा दिया, और मुझे मशवरा दिया कि तीन चिल्ले पूरे करके आना, जमात पढे लिखे लोगों की थी, बहुत अच्छा वक्त गुजरा और अल्हम्दु लिल्लाह इस्लाम मेरी समझ में आगया, अमीर साहब ने मशवरा दिया और मुझे खुद भी तकाजा हुआ कि जमात चार महीने की है, तो मैं भी चार महीने लगाऊँ। जमात में एक मौलाना साहब भी थे जो साल लगारहे थे, कई बार नये साथियों के साथ जमात बट जाती और फिर एक साथ आ जाती। 15 अगस्त को मेरे चार महीने पूरे हुए। 16 अगस्त को हम दिल्ली मर्कज पहुंचे, डॉक्टर नादिर अली खां साहब  से मुलाकात हुयी, उन्होंने मुझे हजरत  मौलाना कलीम साहब से जुडे रहने की ताकीद की, बात शादी की हुयी तो मुझे हिचकिचाहट थी, कि अगर ऐसे बिदअती खानदान में मेरी  शादी हो गयी तो बच्चे अपनी मां के साथ बिदअती होंगे, और नस्लें सही अकल से महरूम रहेंगी, मैं शादी को टालता रहा, एक रोज आसिफा और उसके वालिद ने मुझसे मालूम किया कि शादी करना है कि नहीं? मैं ने साफ-साफ कह दिया कि जमात में जाने से पहले तो आप लोगों को इत्मीनान नहीं था कि मुसलमान हूँ कि नहीं, मगर अब मामला उलटा है, अजमेर में ले जाकर जिस तरह आपने मुझ से शिर्क कराया, कुरआन और हदीस के लिहाज से तो मन्दिर में बुत को पूजना और अजमेर जाकर खाजा-खाजगान की दरगाह पर सर झुकाना बराबर दरजे का शिर्क है। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया है ‘‘जिसने जानबूझ कर नमाज छोडदी उसने कुफ्र किया, अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी लाडली बेटी हजरत फातिमा से फरमाया था कि कब्र में तेरे आमाल काम आयेंगे, यहाँ आपके पीर साहब आपकी नमाज  और रोज अदा करते हैं, और बेवकूफ बनाते हैं। अब अल्लाह का शुक्र है मैं एक मुसलमान हूँ और इस्लाम अकल वालों का मजहब है, यह रस्म का नाम नहीं, अगर आपको मुझ से अपनी लडकी की शादी करना है तो आपको पूरे खानदान वालों के साथ मुसलमान होना पडेगा, जब तक आप लोग मुसलमान नहीं होंगे मैं शादी नहीं करूंगा। मैं ने कहा ‘आपको और आपके तीनों बेटों को चालीस रोज लगाने पडेंगे, यह भी कहा कि जमात वाले मसलक नहीं बदलते, मैंने खुशामद भी की, कई साथियों को उन लोगों से मिलवाया, अल्हम्दु लिल्लाह बडी कोशिश के बाद वह तैयार हुए, पहले मेरे ससुर ने वक्त निकाला, छोटे बेटे शबीर बट को साथ लेकर गये, उसके बाद बडे भाईयों ने वक्त लगाया, उस दौरान अल्लाह का शुक्र है कि मैंने आसिफा को काफी किताबों का मुताला कराया, मैं ने चार महीने में कुरआन मजीद नाजरा पढ़ लिया था, उर्दू अच्छी पढने लगा था, अल्लाह का शुक्र है आसिफा का जेहन साफ हो गया, गुडगांव जामा मस्जिद के इमाम साहब के साथ, मैं आसिफा को लेकर खलीलुल्लाह मस्जिद आया और हम दोनों इमाम साहब के मशवरे से हजरत से बैअत हो गये, जब हजरत हज को गये हुये थे तो हमारी शादी की तारीख तै हो गयी, हजरत ने फोन पर जोर दिया कि यह भी सुन्नत के खिलाफ है कि किसी खास शख्सियत से निकाह पढ़वाने का अहतमाम किया जाये और निकाह में ताखीर की जाये, हजरत ने मुलाकात पर भी निकाह में जल्दी करने का मशवरा दिया था, बल्कि यह भी फरमाया था कि अच्छा है आज ही निकाह हो जाये, दोनों के एक साथ रहने, बात करने का कानूनी हक हो जायेगा, वरना इस तरह बात करना भी गुनाह है, अगर्चे जमात से आकर मैं अल्लाह का शुक्र  है काफी अहतियात करने लगा था। अल्हम्दुलिल्लाह 17 नवम्बर को हमारा निकाह हुआ, फिर जब हजरत वापस आगये तो आसिफा के सारे खान्दान वाले हजरत से बैअत हो गये।


अहमदः आपके घर वालों का क्या हुआ?
मसऊदः अभी मैं ने सिर्फ अपने घर वालों के लिए दुआओं का अहतमाम किया है, अभी जल्दी ही हजरत ने बनारस के एक साहब को हमारे वालिद साहब का फोन नम्बर दिया है, हमारे वालिद साहब रेलवे में एक अच्छी पोस्ट पर हैं, मुगलसराये में उनकी पोस्टिंग है।


अहमदः और भी कुछ लोगों पर आपने काम किया है, इसकी कुछ तफसील बताईये?
मसऊदः हमारी कम्पनी में काम करने वाले एक साथी जो जयपुर के रहने वाले हैं, उनके वालिद दस साल पहले बी.जे.पी. के एम.एल.ए. रहे हैं, अल्हम्दु लिल्लाह मुसलमान होगये हैं, वह जमात में गये हुए हैं।


अहमदः आपकी अहलिया आसिफा का क्या हाल है?
मसऊदः अल्हम्दु लिल्लाह मैं ने मशवरे से तै किया है कि वह सिर्फ दावत का काम करेंगी, उन्होंने मुलाजष्मत छोड दी है, बुरका पहनने लगी हैं, इस्लाम का मुताला कर रही हैं, और कुरआन और सीरत, हजरत के मशवरे से पढना शुरू किया है, हम लोग नेट पर दावत के लिए आनलाइन साइट खोलकर काम का खाका बना रहे हैं, उनकी दोस्त दो लड़कियां उनकी कोशिश से मुसलमान हो चुकी हैं।


अहमदः बहुत-बहुत शुक्रिया मसऊद भाई, अरमुगान के कारिईन के लिए कोई पैगषम आप देंगे?
मसऊदः खानदानी मुसलमानों को रस्मी इस्लाम से निकल कर कुरआनी इस्लाम में लाने का वाहिद तरीका यह है कि मुसलमानों में दावती शऊर बेदार हो, नया खून पुराने बीमार खून को ताजा और साफ करता है, मैं ने अपना इस्लाम कुबूल किया था तो मुझे अपनी ससुराल वालों के इस्लाम की कैसी फिक्र थी बस मैं ही जानता हूँ।


अहमदः बेशक! बहुत पते की बात आपने कही है। अस्सलामु अलैकुम
मसऊदः वालैकुम सलाम 

Wednesday, March 2, 2011

भाई मुज़म्मिल (सोहन वीर) से मुलाकात interview March 2011

अहमद अव्वाहः अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहि वबरकातुह

अहमदः मुज़म्मिल भाई आपका नम्बर भी आ ही गया?
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई, मैंने आपसे कितनी बार कहा कि मेरा इन्टरव्यू भी ले लो।

अहमदः तुम्हारा हाल तुम्हें खुद मालूम है कैसा था, क्या वह इस लायक़ था कि उसे छपवाया जाये, वह तो ऐसा हाल था कि उसे छुपाया जाये बस, फिर यह बात भी थी कि अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) जिसके बारे में फरमाते हैं मैं उनसे ही बात करता हूं, मैंने अबी से तुम्हारी बात कही थी, तो अबी कहते थे ज़रा इन्तज़ार कर लो इसका हाल ज़रा इस लायक होने दो।
मुज़म्मिलः मशहूर है कि बारा बरस में कोडी के दिन भी बहाल हो जाते हैं, अहमद भाई मुझे बारा बरस इस्लाम कुबूल किये हुए हो गये, बल्कि अगर मैं कहूं कि इस्लाम कुबूल करने का ढोंग भरे हुए, तो यह भी सही है।
 
अहमदः वाकई हम पर तुम्हारा अहसान है कि तुम्हारी वजह से हमने अबी को पहचाना और हमें मालूम हुआ कि किसी को बरदाश्त करना और सबर करना किसको कहते हैं, वरना अच्छे-अच्छे हिम्मत हार जाते हैं।
मुज़म्मिलः अहमद भाई आप हज़रत के घर में सबसे नर्म, बरदाश्त करने वाले और रहमदिल हैं, आपने भी मुझे दो बार फुलत से भगाया, लेकिन हज़रत दोनों बार मुझे अपनी गाड़ी में बैठाकर साथ ले आये।
 
अहमदः अच्छा अब डेढ साल से तुमने कोई ड्रामा नहीं किया, कहते हैं चोर चोरी से जाये, हेरा-फेरी से नहीं जाता, तो क्या अब तुम्हारे दिल में पुरानी हरकतें करने की बात नहीं आती?
मुज़म्मिलः अल्हमदू लिल्लाह मेरे अल्लाह का करम है(रोते हुए) अब कुछ भी नहीं आती।
 
अहमदः तुम्हें कलमा पढे हुए कितने दिन हुए?
मुज़म्मिलः कौन-सा वाला कलमा पढे हुए, मैंने तो बिसियों बार कलमा पढा है।
 
अहमदः तुमने इस्लाम कुबूल करने के लिए कलमा कब पढा?
मुज़म्मिलः मौलवी अहमद! मैं ने हर बार इस्लाम कुबूल करने के लिए कह कर कलमा पढा, सबसे पहला ड्रामा मैंने 9 जून 1998 में कलमा पढने का किया, जब थाना भवन के एक बडे आदमी चौधरी साहब मुझे हजरत की खिदमत में लेकर आये थे, इसके बाद मैं ज़रूरत के लिहाज़ से बार-बार कलमा पढकर मुसलमान होने का ड्रामा करता रहा, लेकिन 3 मार्च 2009 को मुझे हज़रत ने जामा मस्जिद फुलत में दस बजकर बाईस मिन्ट पर कलमा पढवाया था उसके बाद से काशिश करता हूं कि इस पर जमा रहूं, हमारे हज़रत कहते हैं कि मुझे हर वक्त डर रहता है कि ईमान रहा कि नहीं, इस खौफ से मग़रिब के बाद और फ़जर के बाद एक बार रोज़ाना ईमान कुबूल करने के लिए कलमा पढता हूं, आपने तो सुना होगा, नव-मुस्लिम आकर कहता है कि मैं नव-मुस्लिम हूं, हज़रत मालूम करते हैं कब मुसलमान हुए? तो वह बताता है कि दो महीने हो गये, दो साल हो गये। हजरत कहते हैं कि आप तो मुझसे पुराने मुसलमान हो, मैं ने अभी फजर के बाद इस्लाम कुबूल किया है या मग़रिब के बाद, हज़रत तो यह भी फरमाते हैं कि हर बच्चा सच्चे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की सच्ची खबर के मुताबिक मुसलमान पैदा होता है, तो अब आप नव-मुस्लिम कहां हुए, आपतो पैदाईशी मुसलमान हैं, अल्हम्दू लिल्लाह 9 जून से रोज़ाना सुबह-शाम ईमान की तजदीद करता हूं, दिन रात मैं कभी-कभी बीच में भी कलमा पढ लेता हूं कि शायद अभी मौत का वक्त करीब हो।
 
अहमदः आजकल तुम कहां रह रहे हो?
मुज़म्मिलः मैं आजकल हजरत के हुक्म से सहारनपुर के एक मदरसे में पढ रहा हूं, यह तो आपके इल्म में है कि मैं अगस्त 2009 में चार महीने जमा‘त में लगाकर आया, और कुरआन शरीफ नाज़रा और हिफज़ (कुरआन कंण्ठस्थ) सात महीने में मुकम्मल किया, 5 अप्रैल 2010 को मेरे हज़रत हमारे मदरसे में तशरीफ लाये, मेरे खत्म कुरआन की दुआ हुई, हज़रत पर इस कद्र रक्कत(रूदन, करूणा) तारी थी कि तकरीर करना मुश्किल हो गया और चालीस मिन्ट की दुआ करायी, सारा मजमा रोता रहा, हजरत ने प्रोग्राम के बाद खाना खाते हुए यह बात कही कि आज मुझे मुज़म्मिल के हिफज(कंण्ठस्थ) की जितनी खुशी हुयी, अगर अल्लाह ने बख्श दिया और जन्नत में जाना हुआ तो शायद इतनी खुशी बस उस रोज़ होगी, उसके बाद मैं ने दौर किया और अल्हम्दू लिल्लाह मैंने जमात में आदिलाबाद में वक्त लगाया, और साथियों को कुरआन शरीफ सुनाया, इस साल अल्हमदुलिल्लाह अरबी पढनी शुरू कर दी है, मैंने हज़रत से वादा किया है इन्शा अल्लाह जल्द हज़रत को आलमियत की सनद दिखानी है, सुमा इन्शाअल्लाह।

अहमदः कुरआन मजीद तो आपका अल्हम्दू लिल्लाह अब बिल्कुल पक्का हो गया है, मगर आपने बडी उम्र में हिफज किया है इस लिये याद करते रहना चाहिए।
मुज़म्मिलः हज़रत से मैंने मालूम किया था कि हमारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का कितना कुरआन पढने का मामूल था तो हज़रत ने बताया कि एक मन्ज़िल रोज़ाना, और बहुत से सहाबा इकराम का भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम कि इत्तबा(अनुसरण) में इस मामूल का जिक्र आता है, मैंने ईद के बाद से तहज्जुद में एक मन्ज़िल पढना शुरू किया है, चन्द दिनों के अलावा जब मुझे डेंगू हो गया था अल्हम्दू लिल्लाह अभी तक नागा नहीं हुआ, हमारे मदरसे में सिफर घण्टे में तर्जुमा(अनुवाद) कुरआन पढाया जाता है, अल्हम्दू लिल्लाह मुझे खासा कुरआन समझ में आने लगा है, कभी-कभी बहुत ही मज़ा आता है।

अहमदः शुरू में जब 1998 में तुम ने कलमा पढा था तो उस वक्त तुम्हारा इरादा मुसलमान होने का था कि नहीं?
मुज़म्मिलः असल में आपको मालूम है, मैं थाना भवन के करीब एक भंगी खानदान में पैदा हुआ, हमारे खान्दान वाले गांव के चैधरियों के यहां सफायी वगैरा करते थे, मेरे पिता जी दस्वी क्लास तक पढे हुये थे, और सोसाईटी में मुलाजिम हो गये थे, मेरी मां भी पढी लिखी हैं, वह एक प्रायमरी स्कूल में टीचर हैं, उन्होंने ही मुझे पढाया, मैं बहुत जहीन था, हाई स्कूल में फ्रस्ट डवीजन पास हुआ, ग्यारहवीं में पहले मुझे शराब की लत लगी फिर और दूसरे खतरनाक नशों का आदी हो गया, और इस तरह के लडकों के साथ बुरी संगती हो गयी, उनमें एक दो मुसलमान भी थे, इण्टर पास करके मेरी मां मुझे डाक्टर बनाना चाहती थीं, मगर मैं आवारा लडकों के साथ लग गया, कुछ रफ्तार मेरी ऐसी तेज़ थी कि जिधर जाता आगे निकल जाता था। थाना भवन में एक गूजर ज़मीनदार के बेटे के साथ मेरे ताल्लुकात बढे जो नशे की वजह से बने थे, उनके यहां हज़रत एक बार नाश्ते के लिए आये थे, मैं वहां मौजूद था, हज़रत से चैधरी साहब के बडे बेटे ने मेरी मुलाक़ात करायी, तो हज़रत ने उनके बेटे जो मेरे साथी थे अल्ताफ से कहा कि अपने दोस्त की खबर लो वरना यह तुम्हें दोज़ख़ में पकड कर ले जायेगा, अल्ताफ के बडे भाई ने मझ से कहा ‘सोहन वीर कब तक तू अछूत रहेगा, मुसलमान होजा’ मैं ने कहा ‘अगर मैं मुसलमान हो जाऊँगा तो मुसलमानों में मेरी शादी होजायेगी?’ उसने कहा ‘ हो जायेगी’। मैं ने सोचा चलो देखते हैं, एक बार मुसलमान होकर देखते हैं अगर जमेगा तो अच्छा है वरना फिर अपने घर आजाऊँगा। मेरे पिताजी का तो शराब की लत में 45 साल की उम्र में इन्तकाल हो गया था, मेरी मां मेरी वजह से बहुत परैशान रहती थी, अल्ताफ के बडे भाई मसरूर मुझे लेकर फुलत पहुंचे, हज़रत ने मुझे कलमा पढवाया, मेरठ भेज कर मेरे कागज बनवाये और मुझे जमात के लिए दिल्ली मर्कज भेज दिया गया, हमारी जमात भोपाल गयी, हज़रत ने यह कह कर पैसे अब्बा इलयास से दिलवाये कि यह कर्ज़ है, जमात से वापस आकर तुम काम पर लगोगे तो वापस करने हैं, जब यह जैब खर्च खत्म हो गया तो मैंने अमीर साहब से कहा कि मैंने घर फोन किया था, मेरी मां बहुत बीमार है मुझे बुलाया है, अमीर साहब से सत्राह सौ रूपये लेकर मैं जमात से वापस आगया, सत्राह-सौ रूपये शराब और गोलियों वगैरा में खर्च किए और थाना भवन पहुंचा, वहां लोगों से कहा कि जमात से मुझे अमीर साहब ने भगा दिया कि तुम नव-मुस्लिम हो हमें मरवाओगे क्या? तुम्हारे घर वाले हमारे सर हो जायेंगे, यह कहा और मुझे भगा दिया, मुझे किराये के पैसे भी नहीं दिये, अल्ताफ ने हज़रत को फोन किया। हज़रत ने कहा कि हम मालूम करेंगे, ऐसा नहीं हो सकता, फिर भी अगर कोई जमात इलाके में काम कर रही हो, उसमें जोड दें, उन्होंने थाना भवन मर्कज जाकर मालूम किया तो मालूम हुआ कि कैराना के इलाके में एक अच्छी जमात काम कर रही है, मुझे जमात के एक साथी लेकर कर कैराना जाकर दूसरी जमात में जोडकर चले आये। जमात में अमीर साहब ने खर्च की रक़म अमानत के तौर पर एक मास्टर साहब के पास रख दी थी, तीन रोज़ तो मैं हिम्मत करके जमात में रहा, मगर मेरे लिए मुश्किल था कि मैं इतनी महनत करूं मैं ने रात मास्टर साहब के जवाहरकट से पैसे निकाले और फरार होगया, जब तक पैसे रहे तफरीह करता रहा और फिर फुलत पहुंचा, हजरत से बडी मुश्किल से वक्त लेकर तन्हाई में मुलाकात की, हज़रत से माफी मांगी और कहा कि पहले मेरी शादी करादें, हज़रत ने मुझे समझाया कि जब तक तुम अपने पैरों पर खडे नहीं होगे कौन अपनी लडकी देगा, तुम खुद सोचो। अगर तुम्हारी कोई बेटी हो तो तुम बेरोज़गार लडके से शादी कैसे करोगे? कुछ सबर करो, अपने हाल को बनाओ, देखो तुम्हारी जिन्दगी का यह अहम मोड है, हमें तुम से सिर्फ तुम्हारे मुस्तकबिल के लिए ताल्लुक है, तुम अच्छी जिन्दगी गुजारोगे तो खुशी होगी, मुझे बहुत समझाया मगर मेरी समझ में बात न आयी, वापस आया और दैनिक जागरण के दफतर में खतोली जाकर एक खबर बनवायीः ‘शादी का वादा पूरा न होने पर हिन्दू जवान ने इस्लाम लौटाया’ और इस्लाम कुबूल करने का सर्टिफिकेट एक लडके के हाथ हजरत के पास भिजवा दिया और हजरत से कहलवा दिया कि इस्लाम मुझे नहीं चाहिए। घर वापस चला गया, मां मुझे देख कर बहुत नाराज हुयी, लेकिन जब मैं ने दैनिक जागरण दिखाया कि इस्लाम छोड कर आया हूं तो बहुत खुश हुयी। घर रह कर फिर वही काम मां को लूटना, शुरू में मां झेलती रही मगर एक रोज़ जब मैं ने ज्यादा नशा करके गांव के एक लडके से लडाई की तो वह बहुत परैशान होगयी और बोली बस सोहन मुझे ऐसे बेटे से अच्छा है कि मैं बगैर बेटे के रहूं, और मेरे घर से मुंह काला करके मुझे निकाल दिया, एक दो रोज़ में घर से इधर-उधर रहा, मुझे कहीं ठिकाना नहीं मिला तो मैंने हिम्मत करके हजरत को फोन किया, इत्तफाक से फोन मिल गया, हज़रत से मैं ने कहा कि में मुज़म्मिल आपका भगौडा बोल रहा हूं, हज़रत ने कहा ‘भगौडा कौन होता, मेरा बेटा मुज़म्मिल बोल रहा है, हज़रत ने पूछाः कहां हो? मैं ने कहा मुज़फ्फरनगर, हजरत ने कहा फुलत आजाओ, मुलाकात पर बात होगी, मैं ने कहा फुलत में मुझे कौन आने देगा, हज़रत ने कहा आजाओ मैं आज फुलत में हूं, फुलत पहुंचा, हज़रत ने गले लगाया, रात को देर तक समझाते रहे, और बोले बेटा जो कुछ तुम अच्छा-बुरा कर रहे हो अपने साथ कर रहे हो, तुम हमें सत्तर बार धोका दोगे हम फखर के साथ धोका खायेंगे, और हज़रत उमर रजि. का वाकिआ सुनाया, हज़रत उमर फरमाते थे दीन के नाम पर कोई हमें धोका देगा तो हम सत्तर बार फखर से धोका खायेंगे, मुझे ज़ोर देते रहे कि तुम जमात में एक पूरा चिल्ला(चालीस दिन) लगा लो, मैं ने आमादगी ज़ाहिर की, मेरे कागजात तलाश कराये तो नहीं मिल सके, दोबारा मेरठ भेज कर कागजात बनवाये और मुझे मर्कज निज़ामुद्दीन भेज दिया गया, इस बार एक जानने वाले साथी को समझा कर मेरे साथ किया, जमात में मेरा वक्त मथुरा में लगा, नशे की आदत मेरे लिए बहुत बडा मसला था, मैं बहुत हिम्मत करता था मगर रूका नहीं जाता था, दो बार मैं ने बाहर जाकर शराब पी ली, अमीर साहब ने हजरत को फोन किया, हज़रत ने एक साहब को मुज़फ्फरनगर से नशा छुडाने की दवा ले कर भेजा, उसको खाने से नशा का मसला हल हो गया, मगर अपनी आज़ाद तबियत की वजह से मैं पूरे चिल्ले मैंने साथियों की नाक में दम रखा, मगर अमीर साहब हज़रत के एक मुरीद थे, उनसे हज़रत ने कह दिया था, अगर आपने मुज़म्मिल का चिल्ला पूरा लगवा दिया तो आपको दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) समझेंगे वरना आप फेल होजायेंगे, उन्होंने लोहे के चने चबाये मगर जमात से वापस नहीं किया, चूंकि मेरा जे़हन बहुत अच्छा था, बिल्कुल न करने के बाद भी मैंने नमाज मुकम्मल और नमाज़े जनाजा याद कर ली, और खाने के, सोने के आदाब, मुखतलिफ दुआऐं याद कर लीं। चिल्ला लगाकर आया तो हजरत बहुत खुश हुए, अमीर साहब को बहुत मुबारकबाद दी और मुझे दिल्ली में एक जानने वाले के यहां नोकरी पर लगवा दिया, चार हजार रूपये माहाना और खाना रहना तै हुआ, रिशेप्शन पर डियूटी थी, वहां पर एक लडकी से मेरे ताल्लुकात हो गये, और मैं उसे लेकर फरार होगया, लडकी के घर वालों ने कम्पनी के मालिक और मेरे खिलाफ एफ.आई.आर. कर दी, सबको परैशान होना था, हज़रत ने किसी तरह अफसरों से सिफारिश करके केस को डील किया, लडकी एक ब्रहम्ण की थी, मैंने उसे कलमा पढवाया और इलाहाबाद लेजाकर कानूनी कार्यवाही करवाई, कम्पनी में तीन और नव-मुस्लिम काम करते थे, कम्पनी वालों ने हजरत से कहा कि इन सभी को कहीं और काम पर लगा दो, हज़रत ने कहा इनको रिज़क देने वाले अल्लाह हैं, आप जैसे कितने लोगों को अल्लाह ने इनकी खिदमत के लिए मालदार बनाया है, हज़रत उन तीनों को लेकर आगये और उसी दिन कोशिश करके उन तीनों को काम पर लगवा दिया, मेरी यह शादी ज्यादा दिन नहीं चल सकी और मैं ने उस लडकी को छ महीने बाद तलाक दे दी।

अहमदः उन दिनों आप कहां रहे?
मुज़म्मिलः मैं ने हज़रत का नाम लेकर कानपुर में एक साहब को अपना बाप बना लिया था और उनके यहां हम दोनों रहे।
 
अहमदः उन्होंने ऐसे में तुम्हें रख लिया?
मुज़म्मिलः मैं हजरत के ताल्लुक के लोगों को निगाह में रखता था, हज़रत से कोई मिलने आया फोरन फोन नम्बर ले लिया, एक दो फोन खेरियत और दुआ के लिए करता था। हज़रत भी बेटा-बेटा उनके सामने करते थे, लोग समझते कि यह हज़रत का बहुत खास है, बस मेरा काम निकलता रहता था।
 
अहमदः इस तरह अन्दाज़न तुमने कितने लोगों से पैसे ऐंठे होंगे?
मुज़म्मिलः लाखों रूपये मैं ने हज़रत के ताल्लुक से लोगों से वसूल किए और सैंकडों ऐसे लोग होंगे जिन से मैं ने फायदा बल्कि हकीकत में नुक्सान उठाया, दसियों मामले तो आपके सामने भी आये, दो बार आपने, एक बार शुऐब भाई ने मुझे फुलत से भगा दिया, आपने तो वार्निंग दी थी कि आज के बाद तुम्हें फुलत में देखा तो अपनी मोजूदगी में मुंह काला करके निकाल दूंगा।
 
अहमदः उस लडकी का क्या हुआ?
मुज़म्मिलः उसका इस्लामी नाम मैंने आमना रखा था, घर वाले उसे मारना चाहते थे, तलाक के बाद उसके लिए फुलत के अलावा कोई जगह नहीं थी, हजरत के पास वह पहुंची, हज़रत ने उसको मेरठ के किसी मदरसे में भेजा, कुछ रोज पढाया, इद्दत का वक्त गुज़रने के बाद गाजियाबाद के एक जानने वाले के बेटे से उसकी शादी कर दी।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः मुझ पर एक बहुत शातिर शैतान सवार था, रोज-रोज नये खेल सुझाता था, मैं ने हज़रत से कुछ बडी रकम ऐंठने की सोची। मैंने मुज़फ्फरनगर इन्टेलीजेंस के दफतर में सम्पर्क किया और वहां एक राजपूत इन्सपेक्टर से दोस्ती कर ली, और कहा फुलत में धर्म बदलवाने का काम होता है, और बडी रकम उनके पास बाहर से आती है
 
अहमदः क्या तुम समझते हो कि ऐसा है?
मुज़म्मिलः मुझे खूब मालूम है कि हज़रत का मिजाज़ तो यहां के लोगों से भी चन्दा करने का नहीं है, बस वैसे ही शैतानी में मैंने ऐसा कहा, मैं ने कहा कि मैं वहां से आपको बडी रक़म दिलवा सकता हूं, मगर उसमें से 25 पतिशत मुझे देना होगा, वह तैयार हो गये। उन्होंने एक आई.बी. कारकुन को जिस का पांव एक हादसे में कट गया था, मेरे साथ भेजा, और एक और साथी को साथ लिया, मैं तो रास्ते में रूक गया और उनको वहां भेज दिया, अब्बा इलयास साहब और मास्टर अकरम का पता बता दिया, वह दोनों फुलत पहुंचे कि हम मुसलमान होना चाहते हैं, हज़रत तो नहीं मिले, मास्टर अकरम के पास गये, उनसे बातें हुयीं, उन्होंने मौलाना उमर साहब से उनको मिलवाया, महमूद भाई भी आ गये, उन्होंने उनको इस्लाम का तार्रुफ(परिचय) करवाया और बताया कि हम लोग तो पैसे लेकर मुसलमान करते हैं, हम तो कलमा पढवाकर इस्लाम देते हैं, इसके लिए कोई रक़म देने या शादी वगैरा का किया तुक है, हमारे यहां तो अगर आप सर्टीफिकेट लेंगे तो पांच सौ रूपये फीस है, वह देनी पडेगी, हम आपको मदरसे की रसीद देंगे, यह लोग और बहसें करते रहे, वहां पर कुछ मिला नहीं तो मायूस होकर वापस आये, मुझ पर बहुत बरसे, वहां से किताब ‘आपकी अमानत-आपकी सेवा में’ लेकर आये, उसको पढकर बहुत मुतास्सिर थे, मैंने कहा इतनी आसानी से बात बनने वाली नहीं, वह मेरे इसरार पर दो-तीन बार गये, कुछ हाथ नहीं आया, उन्होंने मुझे धमकाया कि तुम्हारे खिलाफ मुकदमा बना देंगे, मैं मायूस वापस आया, फिर मैंने बजरंग दल और शिव सेना वालों को भडकाने की कोशिश की, शिव सेना वालों ने फुलत कहलवाया भी कि फुलत वाले यह धर्म बदलवाने का काम या तो बंद कर दें वरना हम इन्तज़ाम करेंगे, हज़रत ने उनके पास साथियों को भेजा, और उनसे काम का तार्रुफ कराया और दफतर वालों से फुलत आने को कहा, बारी-बारी वह लोग आते रहे और फिर मामला ठण्डा हो गया।

अहमदः इसके बाद एक बार पुरकाज़ी में भी तो आपने शादी की थी?
मुज़म्मिलः हज़रत के ताल्लुक के एक काज़ी जी से मैं ने बहुत रो-रो कर अपना हाल सुनाया और उनसे कहा कि मैंने हज़रत को बार-बार न चाहते हुए भी धोका दिया, अब मैं उस वक्त तक हज़रत को मुंह नहीं दिखाना चाहता जब तक एक अच्छा मुसलमान न बन जाऊँ, काज़ी जी ने मुझ पर तरस खाकर मुझे अपने घर रख लिया, उनके यहां कोई औलाद नहीं थी, मैं उनकी दुकान पर बैठने लगा, उन्होंने बिजनौर जिला के एक गांव में अपने रिश्तेदारों में मेरी शादी करा दी बेचारों ने खुद ही शादी वगैरा के इन्तज़ामात किए।
 
अहमदः उन्होंने आपके बारे में तहकीक नहीं की?
मुज़म्मिलः उन्होंने हज़रत से मालूम किया था, हज़रत ने कहा हम दाई(अल्लाह की ओर निमन्त्राण देने वाला) हैं, और दाई तबीब(हकीम) होता है, आखरी सांस तक मायूस होना उसूले तिब(चिकित्सा) के खिलाफ है, कोशिश किजिए, क्या खबर अल्लाह ने उसकी हिदायत आपके हिस्से में लिखी हो।
 
अहमदः उसके बाद क्या हुआ? उस लडकी को भी आपने तलाक़ दे दी है?
मुज़म्मिलः बस आठ महीने में उसके घर वालों का और काज़ी जी के सारे खान्दान का नाक में दम करके, मार-पीट कर तीन तलाक़ देकर भाग आया।

अहमदः उसके बाद क्या हुआ?
मुज़म्मिलः में दर-बदर भटकता रहा, उस दौरान एक बार हिम्मत करके फुलत पहुंचा, मास्टर इस्लाम मुझे मिल गये, हज़रत तो नहीं थे, उन्होंने मुझे डराया, बहुत बुरा-भला कहा कि तूने सब लोगों का एतिमाद खत्म कर दिया, हर नव-मुस्लिम मुहाजिर से यहां के लोग बद ज़न(कुधारणा, बुरे खयाल वाले) हो गये हैं। मैं उनसे बहुत लडा और चला आया। कई बार गलत लोगों के साथ लगा, दो बार दो-दो महीने के जेल में भी रहा। हजरत के किसी जानने वाले ने ज़मानत करायी, अल्लाह का शुक्र है कि जिन लोगों ने मुकदमा कराया था हजरत की सिफारिश से उन्होंने वापस ले लिया। जेल में अल्बत्ता मैंने दो लोगों को कलमा पढवाया, हजरत सब लोगों से कहते थे कि देखो उसकी वजह से पांच लोग जेल में और एक ब्राहम्ण की लडकी आमना मुसलमान हुयी, अब उनकी नस्लों में क्यामत तक कितने लोग मुसलमान होंगे, अब अगर यह हमारी जिन्दगी को जेलखाना भी बना दे तो हमने महनत वसूल कर ली।

अहमदः  सब घर वाले और ताल्लुक वाले तुम्हारी वजह से अबी (मौलाना मुहम्मद कलीम सिद्दीकी) से बहस भी करते थे, अबी अक्सर, बिगडे हुए लोगों और नव-मुस्लिमों के लिए कहते हैं कि जैसे रूह वैसे फरिश्ते, नेक लोगों के पास नेक लोग आते हैं, बदों के पास बद आते हैं, हम फासिक़ और फाजिर धोकेबाज़ ढोंगियों के पास पाकबाज़ और नेक लोग कहां रहने लगे, देखो शराबियों के पास शराबी, जुआरियों के पास जुआरी जमा होते हैं, हम जैसे बदकारों के पास कहां नेक लोग जमा होने वाले हैं, अम्मी जान का इन्तकाल हुआ तो फरमाने लगे कि अम्मीजान नहीं रहीं तो हमें कैसी कमी महसूस हो रही है, हालांकि अपने घर के सारे अज़ीज़ भाई-बहन बीवी-बच्चे मौजूद हैं, यह बेचारे नव-मुस्लिम इनका कोई भी नहीं, अपना सगा बेटा कितना ऐबों में फंस जाता है, कभी किसी से जिक्र भी नहीं करता, न घर से निकालता है, यह बेचारे दर-बदर फिरते हैं, ज़रा-सी बात इनसे हो जाये तो लोग इन्हें निकाल देते हैं, पुराना मुसलमान सारे ऐब करे तो कोई खयाल नहीं, यह कल का मुसलमान सोचते हैं कि फरिश्ता बन जाये और सब धुतकारते हैं, यह कह कर अबी बार-बार रोने लगते हैं।
मुज़म्मिलः एक रोज़ जब में पिछली बार आया था, तो हज़रत से मिला तो मैं ने यह भी कहा कि आपने मुझे इतनी बार बुरी हरकत करने के बावजूद बार-बार मौका दिया, हज़रत ने फरमाया कि मुझ से बुरी हरकत कौन करने वाला होगा, मेरे बेटे तुम मुझ से तो हज़ार दर्जे बेहतर हो, बस अल्लाह ने मेरे ऐब छुपा रखे हैं।
 
अहमदः इस दौरान तुम कितनी बार जमात में गये?
मुज़म्मिलः इन बारा सालों में मुझे सत्राह बार जमात में भेजा गया, एक बार चिल्ला(चालीस दिन) और आखिर में तीन चिल्ले तो पूरे किए, वरना धोका देकर भागता रहा, उसी जमाने में मुझे 21 बार काम से लगाया, या कारोबार कराया, मगर मैं कोई काम करने के बजाये धोका देता रहा।
 
अहमदः अब तुम्हारे दिल में वह बातें नहीं आतीं?
मुज़म्मिलः अल्हम्दू लिल्लाह नहीं आतीं, मुझे ऐसा लगता है वह शैतान जो मुझ पर सवार था वह मेरे हजरत की बरकत से मुझे छोडकर चला गया है, 2 मार्च 2009 को फुलत के एक साहब ने मेरी एक हरकत पर मुझे बहुत मारा, हजरत सफर से रात को देर से तशरीफ लाये, सुबह दस बजे मुझे देखा, मेरा पूरा जिस्म जख्मी था, हज़रत मुझे पकड कर जामा मस्जिद ले गये, मस्जिद जाकर दो रकात नमाज़ पढी, और मुझे देखते रहे और बार-बार चूमते रहे, मेरे बेटे कब तक तुम ऐसी जिल्लत बर्दाशत करते रहोगे, और अगर इसी तरह रहे तो फिर दोज़ख की मार किस तरह सहोगे, चलो आओ अल्लाह से दुआ करें, बहुत देर तक दुआ की, मैं आमीन कहता रहा, फिर बोले मुज़म्मिल आओ दोनों सच्चे दिल से तौबा करें बस, ऐसी तौबा जिसके बाद लौटना न हो, मुझे तौबा करायी, ईमान की तजदीद करायी, और मुझसे वादा लिया कि बस अब मुसलमान दाई बनकर मेरी इज़्ज़त की लाज रखोगे, और सबको दिखा दोगे कि इन्सान कभी भी अच्छा बन सकता है, मैंने वादा किया अगले रोज चार महीने की जमात में चला गया, और अल्हम्दू लिल्लाह जमात में दाढी रखी और खूब दुआ का अहतमाम किया, हज़रत ने जमात से वापस आकर काम पर लगने को कहा, मैं ने हाफिज आलिम बनने की खाहिश का इजहार किया, दाखिला होगया, अल्हम्दू लिल्लाह हिफज मुकम्‍मल होगया, इन्शा अल्लाह बहुत जल्द आलमियत का निसाब मुकम्‍मल कर लूंगा, मेरा इरादा है कि आलमीनी दाई बनूं, इसके लिए एक घण्टे मैं ने अंग्रेजी अच्छी करने के लिए पढनी शुरू कर दी है, अल्हम्दु लिल्लह इस वक्फे में मेरे मदरसे में सब लोग खसूसन असातजा और जिम्मेदार मुझे बहुत चाहते हैं बल्कि मुझ से दुआ कराते हैं।
 
अहमदः माशा अल्लाह, अरमुगान के पाठकों के लिए कोई सन्देश दें?
मुज़म्मिलः बस हजरत की बात ही कहूंगा कि हर मुसलमान एक दाई है और हर दाई एक तबीब है, किसी मरीज से आखरी सांस तक मायूस होना या मर्ज के बुरा होने की वजस से मरीज को अपने दर से धुतकारना उसूले तिब के खिलाफ है, हर इन्सान अल्लाह की बनायी हुयी शाहकार मखलूक है इसको अहसन तक्वीम पर अल्लाह ने अपने हाथों से बनाया है, उस से मायूस नहीं होना चाहिए, बस उसके लिए दिल में दर्द रख कर उसके इस्लाह और उसे दावत देने की फिकर रखनी चाहिए, शायद मुझसे ज्यादा बुरा इन्सान तो अल्लाह की ज़मीन में कोई और हो? जब मैं अपने लिए इन्सान बनने का इरादा करके यहां तक आ सकता हूं तो किसी से भी मायूस होने की क्या वजह है, दूसरी दरखास्त पाठकों से दुआ की है, कि अल्लाह ताला मौत तक मुझे इस्तकामत अता फरमाये और मेरे हज़रत ने जो मुझ से अरमान बनाये हैं और हज़रत फरमाते भी हैं कि मेरी हसरत है कि मुज़म्मिल अल्लाह ताला तुम्हें प्यारे नबी के आंखों की ठण्डक बनाये, मेरी तमन्ना है कि अल्लाह ताला मुझे प्यारे नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की आंखों की ठण्डक बनायें।
 
अहमदः शुक्रिया भाई मुज़म्मिल! वाकई एक ज़माना था कि तुम्हारा नाम सुनकर हम सभी को गुस्सा आ जाता था, मगर अल्हमदू लिल्लाह अब तुम से मिलने की बेचैनी रहती है।
मुज़म्मिलः जी अहमद भाई! मैं इसी लायक़ था और हूं, बस मेरे अल्लाह का करम है कि उसने दिल का रूख मोड दिया है।
 
अहमदः शादी के बारे में तुम्हारा क्या इरादा है?
मुज़म्मिलः अब शादी मेरे लिए कोई बात नहीं रही, अल्हम्दू लिल्लाह मेरे अल्लाह ने मेरे दिल अपनी तरफ फेर दिया है, अब मुझे खिलवत में अपने रब के हुजूर राज़ और नियाज़ का मज़ा मेरे रब ने मुझ गन्दे को लगा दिया है, कुरआन यह कहता है ‘‘इन कुरआन अल्फजर कान मशहूदा’’ सुबह का कुरआन मजीद तो आमने सामने का है, बस ऐसे जमील महबूब से सामना होने लगे तो सारी हसीनायें अन्धेरा लगती हैं, अल्हम्दू लिल्लह मेरे अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत मेरे अल्लाह ने मुझे अता फरमादी है, इसकी वजह से हर एक के सामने हाथ फैलाने से मेरे अल्लाह ने मुझे बचा लिया है।
 
अहमदः आजकल अखराजात वगैरा किस तरह चल रहे हैं?
मुज़म्मिलः अल्लाह के करम से नाला नीम शबी की बादशाहत ने दिल को मालदार कर दिया है, इसकी बरकत से हाथ फैलाने से अल्लाह ने बचा लिया है, अल्हम्दू लिल्लाह अब मुझे खर्च की ज़रूरत नहीं, मैं छुटटी में मज़दूरी कर लेता हूं, मैंने इम्तिहान की छुटटी में मज़दूरी की, और एक हज़ार रूपये हज़रत की खिदमत में हदिया किए, कब से हज़रत आपको लूटता रहा यह हकीर हदिया कबुल कर लिजिए, हजरत ने बहुत गले लगाया और बडी कद्र से कुबूल कर लिया, अब हाथ ऊपर कर लिया है और अल्लाह से सवाल किया है कि अल्लाह अब किसी के आगे हाथ न फैलवायें, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह ताला अब किसी का मोहताज न करेंगे।
अहमदः अच्छा बहुत शुक्रिया। अस्सलामु अलैकुम
मुज़म्मिलः वालैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाही वबरकातुह
with thanks

मार्च 2011, उर्दू मासिक 'अरमुगान'

www.armughan.in